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Alluri Sitaram Rajiu

अल्लूरी सीताराम राजू का जीवन परिचय | Biography of

Alluri Sitaram Rajiu In Hindi -

अल्लूरी सीताराम राजू दक्षिण भारत के महान स्वतंत्रता सैनानी थे | वे 1924 में मात्र 27 साल की उम्र में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुये  | अल्लूरी सीताराम राजू ने दक्षिण भारत के आदिवासियों को एकत्र किया व अंग्रेजों के अत्याचारों के विरुद्ध खड़ा किया और सीमित संसाधनों और हथियारों के सांथ अंग्रेजों से लडाई लड़ी | अल्लूरी सीताराम राजू को अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े गए “ रम्पा विद्रोह “ के लिए याद किया जाता है | लोग उन्हें “ मान्यम वीरुडू “ कहते थे जिसका अर्थ होता है “ जंगलों का नायक “ |

अल्लूरी सीताराम राजू का बचपन| Childhood of Alluri Sitaram Raju -

अल्लूरी सीताराम राजू का जन्म विशाखापत्तनम जिले के पांड्रिक गाँव में 4 जुलाई 1897 को वेंकटरामराजू  के घर में हुआ था | इनके पिता का नाम वेंकटरामराजू और माता का नाम सूर्यनारायणम्मा था | इनके माता-पिता मूल रूप से पश्चिम गोदावरी जिले के मोगल्लू के रहने वाले थे | इनके एक भाई थे जिनका नाम सत्यनारायण राजू और बहन का नाम सीताम्मा थीं| इनके पिता ने बचपन में ही इन्हें सिखाया कि अंग्रेजों ने हमें गुलाम बनाया है और अंग्रेज हमें और हमारे देश को लूट रहे हैं | सीताराम राजू जब मात्र 6 वर्ष के थे तभी इनके पिता का देहांत हो गया और इनका लालन पोषण इनके चाचा रामकृष्ण राजू ने किया | ये बचपन में अपनी स्कूल की पढाई के सांथ-सांथ आयुर्वेद और ज्योतिष की पढाई भी करते थे | पचपन से ही अल्लूरी सीताराम राजू ईश्वर में अटूट विश्वास रखते थे और नियमित रूप से देवी की पूजा और ध्यान करते थे | देशप्रेम के भावना सीताराम राजू में बचपन से ही कूट-कूट कर भरी हुई थीं |

अल्लूरी सीताराम राजू का उत्तर भारत भ्रमण -

अल्लूरी सीताराम राजू ने 1916 में उत्तर भारत का दौरा किया यहाँ ये कांग्रेस के कई नेताओं से मिले और लखनऊ में कांग्रेस अभिवेशन में भाग लिया | इस दौरान इन्होने उत्तर भारत के कई शहरों का भ्रमण किया और आयुर्वेद, पशु प्रजनन , मार्शल आर्ट पर कई किताबें पढ़ी | 1918 में पुनः देश के कई शहरों का भ्रमण किया | सीताराम राजू ने 2 वर्ष सीतामाई नामक पहाड़ी पर एक गुफा में अध्यात्म और चिंतन किया और यंही उन्होंने आदिवासियों की पीड़ा और उन पर अंग्रेजों द्वारा किये जा रहे अत्याचारों को करीब से जाना और आदिवासियों को संगठित करना आरम्भ किया |

अल्लूरी सीताराम राजू और असहयोग आन्दोलन -

शुरुआत में अल्लूरी सीताराम राजू महात्मा गाँधी से बहुत ज्यादा प्रभावित थे | जब असहयोग आन्दोलन अपने चरम पर था तब आन्दोलन आंध्रप्रदेश प्रदेश के इलाकों में भी बहुत तेजी से फ़ैल रहा था | सीताराम राजू ने आदिवासियों की पंचायतों की स्थापना की और आपसी मुद्दे पंचायत में ही सुलझाने शुरू कर दिए | उन्होंने लोगों को ताड़ी (स्थानीय शराब) की लत से दूर रहने के लिए प्रेरित किया और असहयोग आन्दोलन में भाग लेनें के लिए प्रेरित किया | इस दौरान वे एक नेता और प्रेरणास्त्रोत के रूप में उभर रहे थे |

अंग्रजों द्वारा आदिवासियों का शोषण-

इस समय अंग्रेजों के अत्याचार लगातार बढ़ते जा रहे थे और वे आदिवासियों का हर तरह से शोषण कर रहे थे उनकी जमीनों पर कब्ज़ा किया जा रहा था और उनके जंगलों को ठेकों पर दिया जा रहा था | आदिवासियों से कड़ी महनत करवाई जाती और उसका भुगतान भी नहीं किया जाता था | उनके सांथ गुलामों जैसा व्यवहार होता था और महिलाओं पर भी अत्याचार होते थे | सड़क निर्माण को लिए आदिवासियों को कुली कि तरह प्रयोग किया जाता और जब कोई अधिक पैसे की मांग करता तो उसे मौत के घाट उतार दिया जाता था | राजू ने जब इस बारे में वरिष्ठ अधिकारीयों को जानकारियां दीं तो उनकी कोई बात नहीं सुनी गई |

अल्लूरी सीतराम द्वार हथियार उठाना -

धीरे-धीरे सीताराम राजू ने गाँधी जी के विचारों को त्याग दिया और संघर्ष के लिए हथियार उठाने का निर्णय लिया | अल्लूरी सीताराम राजू ने अंग्रेजों द्वारा किये जा रहे अत्याचारों से लड़ने का निश्चय कियऔर जल्द ही वे 30-40 आदिवासी गांवों के नेता बन गए और उन्होंने लोगों को लडाई और गुर्रिल्ला युद्ध की शिक्षा दी | अल्लूरी सीताराम राजू ने रम्पा क्षेत्र को क्रांति के लिए चुना | यह क्षेत्र पहाड़ियों और जंगलों से घिरा था और छापामार और गुरिल्ला युद्ध के लिए अच्छी जगह थी और यहाँ के स्थानीय आदिवासियों से उन्हें पूरा सहयोग मिल रहा था वे अल्लूरी के लिए अपने प्राणों पर भी खेल जाते थे |

 

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Alluri Sitaram Raju

अल्लूरी सीतराम राजू का संगठन -

गेंटम डोरा , मल्लू डोरा , अगीराजू और गामा बंधू अल्लूरी सीताराम राजू के भरोसेमंद थे जिन्हें उन्होंने अपने संगठन में लेफ्टिनेंट का दर्जा दिया | अब उनका संगठन बढता जा रहा था परन्तु वे अभी भी पारम्परिक  हथियारों जैसे धनुष-वाण, भाले और तलवारों से ही युद्ध कर रहे थे | सीताराम राजू जानते थे कि उन्हें अब आधुनिक हथियारों की आवश्यकता पड़ेगी | इसके लिए उन्होंने अंग्रेजों के खजानों को लूटना शुरू किया इससे जो भी पैसा आता उससे हथियार ख़रीदे जाते थे | इन हथियारों से उन्होंने अंग्रेजों के थानों पर हमला करना शुरू कर दिया जिससे उन्हें हथियार भी मिलते थे और अंग्रेजी शासन भी कमजोर होता था |

अल्लूरी सीतराम राजू की क्रान्तिकारी गतिविधियाँ-

 अल्लूरी सीताराम राजू ने 22 अगस्त 1922 को मान्यम विद्रोह शुरू किया जिसमें उनके 150 सैनिक शामिल थे | सीताराम राजू ने अपने 300 सांथियों के सांथ मिलकर चिन्तपल्ली पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया और वहां से बन्दूक, तलवार और गोला बारूद लेकर चले गए और थाने में रखे रजिस्टर पर सीताराम राजू ने हस्ताक्षर कर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई | इसके बाद कृष्णदेवपेट्टा थाने पर हमला का हथियार लुटे गए | उनके द्वरा एक क्रांतिकारी वेरय्याडोरा को मुक्त करवाया गया | वेरय्याडोरा का अपना क्रांतिकारी संगठन था बाद में वेरय्याडोरा अल्लूरी सीताराम राजू के संगठन से जुड़ गए | वेरय्याडो के जुड़ने से अल्लूरी सीतराम राजू की शक्ति दोगुनी हो गई |

अल्लूरी सीतराम राजू से अंग्रजों की हार -

अंग्रेज अब समझ चुके थे कि अल्लूरी सीताराम कोई मामूली व्यक्ति नहीं है उन्होंने अल्लूरी को पकड़ने के लिए स्कार्ट और आर्थर नामक दो अंग्रेज अधिकारीयों को नियुक्त किया | अल्लूरी सीतराम राजू नें अपने 80 समर्थकों के सांथ मिलकर उन पर हमला बोला और इन दोनों को मार डाला | अपनी इस जीत से अल्लुरी और स्थानीय लोग बहुत खुश थे परन्तु अंग्रेज अब पहले से ज्यादा सतर्क हो गए और उन्होंने अल्लूरी सीतराम राजू पर 10 हजार रूपये के इनाम की घोषणा की और लाखो रूपये उन्हें पकड़ने पर खर्च कर डाले | उस समय 10 हजार एक बहुत ही बड़ी रकम थी फिर भी अंग्रेज उन्हें नहीं पकड़ सके और उनके संगठन में लोग लगातार भरती हो रहे थे |

अल्लूरी राजू और उनके सहयोगियों ने अट्टेतेगला थाने , रामपचोड़वरम  थानों को भी लुटा | उनके संगठन में कई गुप्तचर थे जिससे उन्हें अंग्रेजों की गतिविधियों का पहले से ही पता लग जाता था | राजू को पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने साण्डर्स को कमान सोंपी उसे भी मुंह की खानी पड़ी | परन्तु अब अंग्रेज सतर्क हो गए और उन्होंने अपनी ताकत बढ़ाने के सांथ हे अल्लूरी सीताराम राजू पर सिकंजा कसना और तेज कर दिया |

अल्लूरी सीतराम राजू की शाहदत | Martydom Of Alluri Sitaram Rajiu -

6 दिसंबर 1922 में पेद्दागडेपलेम में अंग्रेजों और अल्लूरी के बीच लड़ी गई लडाई में अल्लूरी के 4 सांथी मारे गए इसके बाद एक अन्य लडाई में उनके 8 सांथी मारे गए | इसके पश्चात उनके भरोसेमंद मल्लू डोरा और अगीराजू को अंग्रेजों ने पकड़ लिया | अंग्रजों ने अल्लूरी सीताराम राजू को पकड़ने के लिये सेना लगा दी थी |1922 से 1924 के बीच अल्लूरीसीताराम राजू और अंग्रजों में लगातार मुडभेड होती रहीं |

7 मई 1924 को अंग्रेजों ने अल्लूरी सीतराम राजू को चिन्तपल्ली के जंगलों से पकड लिया इस समय अल्लूरी की दाढ़ी बढ़ी होने से उन्हें पहचनना कठिन था | अंग्रेजों ने उन्हें कोयुरी गाँव में एक पेड़ से बांधकर गोलियों से छलनी कर दिया | इस प्रकार भारत माता का यह सपूत मात्र 27 वर्ष की उम्र में देश के लिए शहीद हो गया |

अल्लूरी सीतराम राजू को नेताजी सुभाषचंद्र चन्द्र बोस ने श्रध्दान्जली देते हुए भारत माता का महान सपूत और युवाओं के प्रेरणास्त्रोत कहा | अल्लूरीसीताराम राजू की याद में भारत सरकार द्वारा 1986 में डाक टिकट जारी किया गया था | धन्य है ऐसे वीर जो भारत माता की आजादी की लडाई में वीरगति को प्राप्त हुए और इतिहास में सदा -सदा के लिए अमर हो गए |

 

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