स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज | Swami Bramhanand ji Maharaj

 

Swami Bramhanand ji Maharaj
 Swami Bramhanand ji Maharaj

स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज  जीवन चरित्र  | Swami Bramhanand jivan charitra -

स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज लोधी समाज के एक महान संत और समाज सुधारक और  स्वतंत्रता सेनानी थे | स्वामी ब्रम्हानंद ने समाज में फैली कुरूतियों को मिटाने के लिये काम किया | देश की आजादी के लिये उन्होंने गाँधी जी के सांथ कई आन्दोलन किये और कई बार जेल भी गए | देश की आजादी के  के बाद  वे उत्तर प्रदेश के हमीरपुर से दो बार सांसद भी रहे |उन्हें देश का पहला भगवाधारी (सन्त ) सांसद माना जाता है  | उन्होंने सन्यास ग्रहण करने के बाद कभी भी पैसे को हाँथ नहीं लगाया |  स्वामी ब्रह्मानन्द ने देश में शिक्षा पर व्यापक कार्य किया उन्होंने कई शिक्षण संस्थायें भी खोलीं | स्वामी ब्रह्मानन्द  गौ-हत्या के विरोध में देश का सबसे बड़ा आन्दोलन प्रारंभ किया और  इसके लिये उन्हें जेल भी जाना  पड़ा |

स्वामी ब्रह्मानन्द लोधी का प्रारंभिक जीवन -

स्वामी ब्रम्हानंद का जन्म 4 दिसम्बर 1984 को उत्तर प्रदेश के बरहरा  गाँव में हुआ | बरहरा हमीरपुर जिले की राठ तहसील के अंतर्गत आता है | स्वामी ब्रम्हानंद के बचपन का नाम शिव दयाल था | स्वामी ब्रम्हानंद के पिता  का नाम मातादीन लोधी था जो एक साधारण से किसान परिवार से थे | उनकी माता का नाम जसोदा बाई था |  बरहरा में उनका घर आज जर्जर अवस्था  में है | गाँव में उनका एक मंदिर भी है जो लोगों की आस्था का केंद्र है | शिव दयाल के बचपन की  शिक्षा हमीरपुर में हुई | बाद में धर्म ग्रंथों का अध्ययन उन्होंने हर में ही किया |  स्वामी ब्रह्मानंद जी का विवाह सात वर्ष की उम्र में राधा बाई से हुआ | राधा बाई के पिता का नाम गोपाल महतो था वे भी हमीरपुर के रहने वाले थे | स्वामी ब्रम्हानंद और राधा बाई के एक पुत्र और एक पुत्री थे |

स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज का सन्यासी बनना -

स्वामी ब्रह्मानन्द जी ने 24 वर्ष की आयु में परिवार का मोह त्याग कर दिया और हरिद्वार की हर की पोंडी में  संन्यास  की दीक्षा ली और लोग अब उन्हें शिव दयाल लोधी के स्थान पर स्वामी ब्रम्हानंद नाम से जानने लगे | संन्यास लेने के बाद स्वामी ब्रह्मानंद सम्पूर्ण भारत के तीर्थ स्थानों का भ्रमण किया। इस दौरान उनका संपर्क कई महान साधु संतों से हुआ। इसी बीच उन्हें गीता रहस्य प्राप्त हुआ | सन्यास ग्रहण करने के बाद स्वामी ब्रम्हानंद ने कई पाठ शालायें खुलवाई और गौ-रक्षा के लिये आन्दोलन चलाये | 1956 अखिल भारतीय साधु संतों के अधिवेशन हुआ जिसमे भारत के प्रथम राष्ट्रपति स्वर्गीय डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी सम्मिलित हुए | इस अधिवेशन में स्वामी ब्रम्हानंद को आजीवन सदस्यबनाया गया |

स्वामी ब्रह्मानन्द जी का स्वतंत्रता आन्दोलन में योगदान -

 पंजाब के भटिंडा में  स्वामी ब्रह्मानन्द  भेंट महात्मा गाँधी से हुई। स्वामी जी सन् 1921 में गाँधी जी के संपर्क में आकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े और बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया ।स्वामी ब्रह्मानंद के प्रयासों से गाँधी जी 1928 में स्वामी ब्रह्मानन्द की जन्मस्थली राठ आये । 1930 में स्वामी जी ने नमक आन्दोलन में भाग लिया।  इस बीच उन्हें दो वर्ष के लिये जेल जाना पड़ा | 1942 में स्वामी ब्रम्हानंद को पुनः भारत छोड़ो आन्दोलन में जेल जाना पड़ा। इसी बीच वे कानपूर, हरदोई और हा,हमीरपुर की जेलों में भी रहे |  स्वामी जी ने अपनी मात्रभूमि को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त करवाने के लिये लोगों को जागरूक किया और आजादी के आन्दोलन में भाग लेनें के लिये प्रेरित किया |

स्वामी ब्रह्मानन्द जी का शिक्षा में योगदान -

स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज ने बुन्देलखण्ड में शिक्षा के प्रसार के लिये अथक  प्रयास किये । उनका मानना था कि देश में फैली कुरूतियों को शिक्षा के द्वारा ही हटाया जा सकता है | उन्होंने पंजाब और उत्तर भारत में कई पाठशालायें खुलबाई | स्वामी ब्रम्हानंद ने  हमीरपुर में वर्ष 1938 में ब्रह्मानंद इंटर कॉलेज़, 1943 में ब्रह्मानन्द संस्कृत महाविद्यालय तथा 1960 में ब्रह्मानन्द महाविद्यालय की स्थापना की। वर्तमान समय में देश के कईहिस्सों विशेषकर  बुंदेलखंड में स्वामीब्रम्हानंद नाम सेस्कूल ,कॉलेज और शिक्षण संस्थायें चल रही हैं |

स्वामी ब्रह्मानन्द जी का गौ- रक्षा के लिये प्रयास -

स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज गौ-हत्या को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित थे | उन्होंने  गौ-हत्या  के विरोध में 1966 में अब तक का सबसे बड़ा  आन्दोलनचलाया जिसमे करीब 11-12 लाख लोग शामिल हुए | इससे तात्कालीन सरकार  घबरा गई और उन्हें जेल भेज दिया गया | जेल से आने के बाद सरकार के इस कदम  के विरोध में स्वामी ब्रम्हानंद ने प्रण किया की  अब वो संसद जायेंगे और वहीँ अपना पक्ष रखेंगें | 1967 में हमीरपुर लोकसभा सीट से जनसंघ से चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीतकर संसद भवन पहुंचे। संसद में उनके द्वरा गौ-हत्या पर दिए गए भाषण को ऐतिहासिक मन जाता है | वे भारत के पहले सन्यासी थे जो आजाद भारत में सांसद बने। स्वामी ब्रम्हानंद  जी 1967 से 1977 तक हमीरपुर से सांसद रहे। 1972 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के आग्रह पर स्वामी जी कांग्रेस से चुनाव लड़ा और जीते |

स्वामी ब्रह्मानन्द जी का पैसा न छूने का प्रण -

स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज की कोई निजी संपत्ति नहीं थी। संन्यास ग्रहण करने के बाद ने पैसा न छूने का प्रण लिया था और इसका पालन मरते दम तक किया। उन्हें जिंदगी में जो कुछ मिला वह सब लोगों की शिक्षा और कल्याण में खर्च कर दिया |  वे अपनी पेंशन छात्र-छात्राओं के हित में दान कर दिया करते थे| उनका मानना था की उनके पास जो भीरुपया-पैसा है उस पर देश के लोगों का अधिकार है |

स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज द्वारा देह त्याग -

महान कर्मयोगी , समाजसेवी और स्वतंत्रता आन्दोलन के प्रणेता स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज 13 सितम्बर 1984 को ब्रह्मलीन हो गए। ऐसे महान कर्मयोगी को शत-शत नमन् |

स्वामी ब्रह्मानन्द के  संबंध में महत्वपूर्ण तथ्य -

स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज गोरक्षा आंदोलन के प्रणेता थे | वे  लोधी राजपूत समाज के पहले सांसद के सांथ सांथ  भारत के पहले संत(सन्यासी ) सांसद भी थे | भारत सरकार 14  सितंबर 1997  को स्वामी ब्रम्हा नन्द जी की स्मृति में डाक टिकट जारी किया।  विरमा नदी पर स्थित बांध का नाम स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज के नाम पर स्वामी ब्रम्हानंद रखा गया है यह बाँध हमीरआवर जिले में बनाया गया है ।

वीर दुर्गादास राठौर का जीवन परिचय और इतिहास | Veer Durgadas Rathore Biograpbhy and history in hindi -

 
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वीर दुर्गादास राठौर जीवनी और इतिहास  | Veer Durgadas Rathore Biograpbhy and history in hindi -

वीर दुर्गादास राठौड़ (राठौर)  एक महान राजपूत योद्धा थे जिन्होंने अपनी मात्रभूमि  मारवाड़ (जोधपुर ) को मुगलों के आधिपत्य से मुक्त करवाया  और हिन्धू धर्म की रक्षा की | वीर दुर्गादास ने मारवाड़ के राजकुमार अजीत सिंह को औरंगज़ेब के चंगुल से मुक्त करवाकर  दिल्ली से मारवाड़ लाये और लगातार कई वर्षों तक मुगलों से संघर्ष कर अजीत सिंह को मारवाड़ का राजा बनवाया | अजीत सिंह के पिता राजा जसवन्त सिंह ने उन्हें भविष्य में मारवाड़ का रक्षक कहा था  जिसे उन्होंने सत्य  सिद्ध कर दिखाया | वीर दुर्गादास को मारवाड़ का मोती और मारवाड़ उद्धारक भी कहा जाता है | उनकी वीरता , कर्तव्य निष्ठा और ईमानदारी के किस्से न सिर्फ मारवाड़ में वल्कि पुरे राजस्थान में गाए जाते हैं | आज भी राजस्थान में कहा जाता है '' माई ऐहड़ौ पूत जण, जेहड़ौ दुर्गादास'' अर्थात माता ऐसे पुत्र को जन्म देना जैसे दुर्गादास |

वीर दुर्गादास राठौर   का जन्म और का बचपन | Veer Durgadas Birth and Early Life-

 वीर दुर्गादास राठौर  का जन्म 13 अगस्त 1638  को ग्राम सालवा में हुआ था | वे सूर्यवंशी राठौड़ कुल के राजपूत थे |  उनके पिता का नाम आसकरण था जो मारवाड़ ( जोधपुर) के महाराजा  जसवन्त सिंह (प्रथम) के  राज्य की दुनेवा जागीर के जागीदार थे | वीर दुर्गादास राठौड़ की माता का नाम नेतकँवर बाई था |  दुर्गादास की माता अपने पति आसकरण से  दूर सालवा के पास लुडावे (लुडवा ) गाँव में रहती थीं | बचपन में दुर्गादास का  लालन पोषण उनकी माता नेतकँवर ने ही किया और उनमें स्वाभिमान और देशभक्ति के संस्कार कूट-कूट डाले |

वीर दुर्गादास को महाराजा जसवन्त सिंह का बुलावा -

एक समय की बात है एक पशु चारक राईका दुर्गादास राठौर के खेत में अपने ऊंट चराने लगा | बालक दुर्गादास के मना करने पर भी वह नहीं माना और उसने मारवाड़ के महाराजा जसवंतसिंह के बारे में अपशब्द कहे जिससे  दुर्गादास को अत्यधिक क्रोध आया और उन्होंने अपनी तलवार निकाली  और उस उस चरवाहे को मार दिया |जब यह समाचार महाराजा जसवंतसिंह तक पहुंचा तो उन्होंने दुर्गादास राठौड़ को अपने राजभवन बुलवाया और उस राईका को मारने का कारण पूछा | बालक दुर्गादास ने निर्भय होकर महाराज के सामने बतलाया कि  वह अनाधिकृत रूप से दूसरे के क्षेत्र में अपने मवेशी  चरा रहा था और महाराज और मारवाड़ राज्य के बारे में गलत बातें कर रहा था इसी कारण मैंने उसे मारा है | महाराजा जसवन्तसिंह ने  दुर्गादास राठौड़ की निर्भीकता और साहस से खुश होकर उन्हें क्षमा करते हुए अपनी सेना में शामिल कर लिया | धीरे-धीरे वीर दुर्गादास राठौड़ की बहादुरी की चर्चा चारो ओर फैलने लगी | अब महाराजा जिधर  भी जाते दुर्गादास को अपने सांथ ले जाते |महाराजा जसवन्त सिंह वीर दुर्गादास को मारवाड़ का भावी रक्षक कहा करते थे |

महाराजा जसवन्त सिंह की मृत्यु और अजीत सिंह का जन्म -

 इस समय दिल्ली की गद्धी पर औरंगजेब का शासन था  उसने षड्यंत्र पूर्वक  1678 में महाराजा जसवन्त सिंह को पठानों के विद्रोह को दबाने के लिये अफगानिस्तान भेजा | जहाँ नवम्बर-दिसम्बर 1678 को  उनकी मृत्यु हो गई | औरंगज़ेब पूरे  भारत को मुस्लिम राष्ट्र बनाना चाहता था | महाराजा जसवन्त सिंह की मृत्यु से वह बहुत खुश था क्यूंकि मारवाड़ में अब वह बड़ी आसानी से अपने मंसूबे पूरे कर सकता था |जिस समय महाराजा जसवन्त सिंह की मृत्यु हुई उस समय उनकी कोई भी जीवित पुत्र संतान नहीं थी | उनकी मृत्यु के समय उनकी दो रानियाँ रानी जादम और रानी नरुकी गर्ववती थीं | फरवरी 1679 में  दोनों रानियों ने अलग-अलग पुत्रों को जन्म दिया |रानी जादम के पुत्र का नाम अजीत सिंह और रानी नरुकी के पुत्र का नाम रणथम्बन रखा गया | जन्म के कुछ समय पश्चात रणथम्बन की मृत्यु हो गई | औरंगज़ेब ने महाराजा जसवन्त सिंह  की मृत्यु के बाद जोधपुर पर कब्ज़ा कर लिया और शाही हाकिम को वहां बिठा दिया कुछ समय पश्चात उसने महाराजा जसवन्त सिंह  के करीबी रिश्तेदार ( भाई अमरसिंह के  के पोत्र) और अपने बफादार  कीर्ति सिंह को मारवाड़ की  गद्दी पर बैठाया | कीर्ति सिंह एक तरह से कठपुतली  शासक था और शासन की बागडोर औरंगज़ेब के हांथों में थी | इस दौरान औरंगज़ेब ने जोधपुर और मारवाड़ में कई मंदिर तोड़े |

वीर दुर्गादास और अजीत सिंह का दिल्ली जाना -

वीर दुर्गादास राठौर और और मारवाड़ के कुछ प्रमुख सैनापति मारवाड़ को औरंज़ेब की अधीनता से मुक्त कराना चाहते थे | वीर दुर्गादास राठौर कुंवर अजित सिंह को मारवाड़ का शासक घोषित करवाने के लिये मारवाड़ के  कुछ प्रमुख जागीदारों और सम्पन्न  लोगों के सांथ औरंगजेब के दरवार पहुंचे | औरंगजेब ने अजीत सिंह को राजा बनाने के संबंध में कोई भी स्पष्ट बात ना करते हुए कहा कि जब तक अजीत सिंह बड़े नहीं हो जाते तब तक वो दिल्ली में मुगलिया देख रेख में रहेंगे और इसके बाद ही अजीतसिंह को राजा बनाने के संबंध में कोई निर्णय लिया जायेगा |इतिहासकारों के अनुसार  संभवतः औरंगजेब अजीतसिंह को मारना चाहता था या  उनसे इस्लाम धर्म स्वीकार करावाना चाहता था | इस  दौरान  अजीत सिंह अपनी माता जादम के सांथ  दिल्ली में रूप सिंह राठौड़ की हवेली में ही रहे | वीर दुर्गादास राठौड़  औरंगजेब की इस नीति को भांप गए और अजीत सिंह को दिल्ली से जोधपुर लाने की योजना में लग गए |veer durgadas rathore

 वीर दुर्गादास द्वारा अजीत सिंह को दिल्ली से मुक्त कराना -

वीर दुर्गादास राठौड़ ने अजीत सिंह को दिल्ली से निकालने की योजना बनाई | वीर दुर्गादास ने ठाकुर मोकम सिंह बलुन्दा , मुकुंद दास खिंची , रणछोर दास राठौड़ और रघुनाथ भाटी  के सांथ मिलकर एक योजना बनाई | योजना के अनुसार अजीत सिंह को दिल्ली से निकालने के लिये राजपूत योद्धाओं के अलग-अलग दल बनाए गए | इनमे से एक दल पर अजीत सिंह को दिल्ली से मारवाड़ तक लाने, दूसरे दल पर दिल्ली की हवेली में मुग़ल सेना को रोकने और अन्य दलों को पीछा करने वाली  मुग़ल सेना पर हमला कर उसे रास्ते में ही रोकनी की जिम्मेदारियां मिलीं  | राजकुमार अजित सिंह को दिल्ली की हवेली से निकालने के संबंध में अलग-अलग स्त्रोतों से अलग-अलग जानकारी मिलती है | कवि  जगजीवन भट्ट द्वारा रचित अजीतोदय काव्य के अनुसार  ठाकुर मोकम सिंह चांदावत  की धर्मपत्नी बघेलीजी ने अपनी नवजात पुत्री को अजीत सिंह के स्थान गौरा धाय को हवेली में दे  दिया और उनके स्थान पर अजित सिंह को ले आयीं गौरा  अजीत सिंह धाय थीं |  बूंदी के शासक सूर्यमल मिश्रण द्वारा रचित वंश भास्कर काव्य के अनुसार गोविन्द दास  ने कालवेलिया (सांप पकडने वाले ) का वेश बनाया और सांप की टोकरियों में अजीत  सिंह और दलथम्बन को ले आये इसमें  उनके सांथ दुर्गादास भी थे  | गौरा धाय ने राजकुमार के स्थान  खुद अपनी  नवजात बच्ची को रख दिया |  इस तरह गौरा धाय ने मेवाड की  पन्ना धाय  की तरह अपने कर्तव्य का निर्वहन किया और अजीत सिंह की जान बचाई | इसी कारण उन्हें मारवाड़ की पन्ना धाय  भी कहा जाता है |अंग्रेज इतिहासकार  जेम्स टाड के अनुसार अजीत सिंह को मिठाई की टोकरी में रखकर दिल्ली से निकला गया | कुछ स्त्रोतों के अनुसार दलथम्बन की मृत्यु दिल्ली से मारवाड़ आते समय रास्ते में  हुई जबकि कुछ स्त्रोतों के अनुसार दलथम्बन की मृत्यु जन्म के बाद ही हो गई थी |

वीर दुर्गादास और मुगलों का रास्ते में संघर्ष -

इतिहासकारों के अनुसार एक दिन औरंगज़ेब के आदेश पर मुग़ल सेना ने उस हवेली को घेर लिया जिधर अजित सिंह रुके थे | कहा जाता है की मुग़ल सेना के हवेली आने के पूर्व ही वीर दुर्गादास कुंवर अजीत सिंह को हवेली से निकाल चुके थे | मुग़ल सेना के हवेली आने पर हवेली में रुके राजपूत सैनिकों को मुग़ल सेना में जमकर संघर्ष हुआ | मुगलों के सामने राजपूतों की टुकड़ी बहुत छोटी थी फिर भी राजपूत सैनिकों ने मुग़ल सेना को भारी नुकसान पहुँचाया | हवेली में एक-एक राजपूत पूरी बहादुरी से अधिरी सांस तक लड़ा | मुग़ल टुकड़ी ने हवेली से निकलकर वीर दुर्गादास और अजित सिंह का पीछा किया और दोनों तरफ से जबरदस्त संघर्ष हो रहा था | रास्ते में रणछोड़ दास राठौर अपने दल बल के सांथ  मुग़ल टुकड़ी का इन्जार कर रहे थे  और उन्होंने बहुत देर तक मुग़ल सेना को रोके रखा अंत में रणछोड़ दास राठौड़ वीर गती कप प्राप्त हुए | काफी संघर्ष के बाद शाम होते-होते दुर्गादास राठौड़ ने अजीत सिंह को मारवाड़ की सीमा तक पंहुचा दिया | अब तक मुग़लटुकड़ी काफ़ी थक चुकी थी और उसे भी भारी छति पहुंची थी इसी कारण वह वापस लौट गई |इस संघर्ष में कई राजपूत सैनकों ने अपने प्राणों की आहूति दी | वीर दुर्गादास बालक अजित सिंह को मारवाड़ राज्य में सिरोही के पास कालिन्दी गाँव ले गए | कालिन्दी में अजित सिंह को जयदेव नामक पुरोहित के घर रखा गया | यहाँ मारवाड़ के बफादार मुकुलदास खिंची ने साधू वेश में रहकर अजित सिंह की रक्षा की | इसी बीच वीर दुर्गादास में मेवाड के राणा राज सिंह से सहायता मांगी |राणा राज सिंह ने मेवाड़ की एक छोटी सी रियासत केलवा का पट्टा  वीर दुर्गादास को दिया और अजित सिंह को संरक्षण देने का वादा किया |

वीर दुर्गादास द्वारा  औरंगज़ेब के पुत्र अकबर को अपनी ओर मिलाना -

इन सब घटनाओं से औरगाज़ेब बहुत गुस्से में था और उसने अपने पुत्र सुल्तान मुहम्मद अकबर को वीर दुर्गादास को सबक सिखाने के लिये भेजा | परन्तु वीर दुर्गादास  और मेवाड के महराजा राज सिंह ने ने बड़ी की सूझबूझ और चालाकी से अकबर को अपनी तरफ मिला लिया | उन्होंने  शहजादा  अकबर को दिल्ली का बादशाह बनाने का लालच दिया | 1681 में अकबर ने अपने आप को अगला मुग़ल बादशाह घोषित कर दिया |परन्तु इसी बीच मेवाड के महाराजा राज सिंह की मृत्यु हो गई | परन्तु वीर दुर्गादास ने हार नहीं मानी और अकबर को लेकर मराठों के पास चले गये | जब यह बात अकबर को पता चली तो उसने अपना ध्यान मारवाड़ से हटाकर दक्षिण में मराठों पर लगाया | परन्तु दुर्भाग्य से वीर   दुर्गादास की यह योजना भी  सफल नहीं हो सकी  अकबर को निर्वासित होकर फारस  जाना पड़ा | इस दौरान वीर दुर्गादास मारवाड़ को मुगलों की अधीनता से मुक्त करवाने का प्रयास करते रहे |वीर दुर्गादास को मुगलों की तरफ से पैसे और अच्छा पद दिए जाने की पेशकस की गई परन्तु उन्होंने कबी भी अपने ईमान से समझौता नहीं किया | वीर दुर्गादास राठौड़ ने गौरिल्ला युद्ध नीति अपनाई | इस दौरान वे लगातार मुग़ल सैनिकों और उनकी टुकड़ियों पर हमला करते और उन्हें लूट लेते थे जिससे मुग़ल सैनिकों के मन में वीर दुर्गादास राठौड़ का भय व्याप्त हो गया और मुग़ल राजकोस को भी काफी  क्षति पहुंची |

वीर दुर्गादास द्वारा शहजादा अकबर की संतानों को संरक्षण देना-

अकबर की दो  संतान  जिनमे एक पुत्र और एक पुत्री थीं | अकबर की संतानों  की देख रेख वीर दुर्गादास ने की |  औरंगज़ेब ने  वीर दुर्गादास से अकबर की संतानों  को दिल्ली भिजवाने का आग्रह किया जिसे वीर दुर्गादास ने स्वीकार कर लिया और  अकबर की पुत्री    को दिल्ली भिजवा दिया | औरंगज़ेब यह जानकार हैरान हुआ की इसके पोता-पोती की शिक्षा दुर्गादास ने मुस्लिम काजी से मुस्लिम रीति रिवाजों से करवाई | औरंगज़ेब ने वीर दुर्गादास को मनसब देने का प्रस्ताव दिया परन्तु दुर्गादास ने कोई भी निजी फायदा लेने से इंकार कर दिया और लगातार अजित सिंह को राजा बनाने की बात पर अड़े रहे |

Veer Durgadas Rathore
Veer Durgadas Rathore

 अजीत सिंह का राज्याभिषेक -

लगभग  20 साल तक मारवाड़ सीधे मुग़ल शासन के अधीन रहा | इसी बीच वीर दुर्गादास राठौर मेवाड के राजाओं  और मराठों से लगातार संपर्क  में रहे  |अब तक अजित सिंह  बड़े हो चुके थे |  1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु हो गई इस मौके  का वीर दुर्गादास और अजित सिंह ने पूरा फायदा उठाया और मुग़ल सेना को मारवाड़ से खदेड़ दिया | बड़े ही धूम-धाम के सांथ अजित सिंह मारवाड़ के राजा बने | वीर दुर्गादास राठौर ने महाराज  जसवंत सिंह को अपना दिया  वचन पूरा किया और उनके द्वारा दी गयी मारवाड़ के भावी रक्षक की उपाधि को सत्य सवित कर दिया | अमर सिंह के राजा बनने के बाद औरंगज़ेब द्वारा तोड़े गए मन्दिरों का पुनःनिर्माण करवाया गया  |

वीर दुर्गादास राठौर की मृत्यु | Veer Durgadas Rathore dies -

 वीर दुर्गादास राठौर ने औरंगज़ेब की इस्लामीकरण की साजिस को असफल कर अपने धर्म की रक्षा की और  जीवन भर  मारवाड़ की सेवा करते रहे |मारवाड़ में उन्होंने कोई बड़ा पद स्वीकार नहीं किया | अजीत सिंह के राजा बनने के बाद कुछ लोगों ने अजीत सिंह को दुर्गादास के विरुद्ध भड़काना शुरू कर दिया और अजीत सिंह का दुर्गादास के प्रति व्यवहार बदलने लगा | स्वाभिमानी वीर दुर्गादास  राठौर ने सन्यास ले लिया  | वे मारवाड़ से मेवाड़ के विजय नगर चले गए और जीवन के अंतिम दिन भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन में क्षिप्रा के तट पर बिताये |वीर दुर्गादास राठौर की मृत्यु 22 नवम्बर 1718  हुई  |उज्जैन  जिस स्थान पर उनका अंतिम संस्कार किया गया वहां  सुन्दर  नक्कासी युक्त वीर दुर्गादास की छतरी बनाई गई है | यह स्थान राजपूतों और देशभक्तों के लिये प्रेरणा स्त्रोत है |

जीवन अनमोल है -हिंदी कहानी | Life is precious -

 

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जीवन अनमोल है -हिंदी कहानी  | Life is precious  -

बहुत पुरानी बात है एक व्यक्ति था  उसका नाम दीन दयाल था | उसके परिवार में उसका, पुत्र, पुत्री , पत्नी और माता ,पिता रहते थे | वह ख़ुशी पूर्वक अपना जीवन यापन कर रहा था | उसकी आय ज्यादा  नहीं थी अब उसके बच्चे भी बड़े हो रहे थे | बच्चों के बड़े होने से उसके खर्चे भी बढ़ रहे थे | दीन दयाल घर में अकेला कमाने वाला व्यक्ति था | वह घर के खर्चों की पूर्ति ठीक तरीके से नहीं कर पा रहा था इसी कारण उसने साहूकारों से व्याज पर पैसे लेना शुरू  कर दिया | शुरू -शुरू में तो वह सहकरसाहूकार के  पैसे समय पर लौटा देता था परन्तु बाद में उसे पैसे चुकाने में दिक्कत  होने लगी | अब उसके परिवार में भी कलह और विवाद होने लगे |
उसने परिवार में संतुलन बनाने का बहुत प्रयत्न किया परन्तु वह सफल नहीं हो पा रहा था | कर्ज और रोज-रोज के पारिवारिक विवादों से वह बहुत परेशान हो गया और एक दिन उसने आत्महत्या करने की सोची | लेकिन यह निर्णय इतना आसन नहीं था | दीन दयाल घर का मुखिया था  और परिवार का भविष्य उस  पर निर्भर था | अब  उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये ?
दीन दयाल  घर के पास ही एक ऋषि का आश्रम था | वह सही मार्गदर्शन के लिये ऋषि के आश्रम पहुँच गया और महर्षि को प्रणाम कर अपने आने का कारण बतलाया | महर्षि आपने काम में व्यस्त थे और उन्होंने दीन दयाल की बातों का कोई उत्तर नहीं दिया | वे बड़ी मेहनत और तल्लीनता से आश्रम वासियों के लिये भोजन के लिये पत्तल बना रहे थे | अपनी बातों का उत्तर ना  पाकर और महर्षि की पत्तल बनाने में तल्लीनता देखकर दीन दयाल के मन में कई प्रश्न उठने लगे |
दीन दयाल ने हिम्मत कर महर्षि से से पूछ ही लिया - महर्षि ! आप इतनी लगन और मेहनत से ये पत्तलें बना रहे हैं परन्तु भोजन के बाद इन पत्तलों को कूड़े में फेंक दिया जायेगा |
महर्षि मुस्कुराते हुए बोले- वत्स ! तुम बिल्कुल सही कह रहे हो परन्तु किसी भी वस्तु को उपयोग करने के बाद फेंकना गलत नहीं है | गलत तो तब होगा जब उस वस्तु को उपयोग किये  बिना अच्छी अवस्था में फेंका जाये | इसी तरह हमारा शरीर भी है |
महर्षि की बात दीन दयाल को अच्छी तरह समझ में आ गई और उन्हें अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया कि जीवन अनमोल है  | दीन दयाल ने अब आत्म-हत्या  का विचार त्याग दिया | वह समझ गया कि विपरीत परिस्थितियों से हार मानना ठीक नहीं है उससे लड़कर ही सफलता पाई जा सकती है | अब वह  जीने के उत्साह से सरावोर हो गया कठिन मेहनत कर ना सिर्फ साहूकारों का कर्ज उतारा वल्कि अपनी संतानों को योग्य बनाकर अपने पैरों पर खड़ा किया |

शिक्षा-  जीवन अनमोल है कहानी से हमें शिक्षा मिलती है की विपरीत परिस्थियों से लड़ कर ही सफलता पाई जा सकती है |

कौवा , सांप और सोने का हार कहानी | Crow, Snake and gold necklace story


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कौवा , सांप और सोने का हार कहानी  | Crow, Snake and gold necklace story -

बहुत समय पहले की बात है एक पेड़ पर एक कौवा और उसकी पत्नी रहते थे | कुछ दिनों बाद  उसी पेड़ के नीचे बिल में एक सांप रहने के लिये आ गया | एक बार कौवा की बीबी ने कुछ अंडे दिये  | कौवा और उसकी पत्नी अपने अण्डों को घोंसले में छोड़कर खाने की तलाश में निकल गये और जब वे वापस लौटे तो उन्हें  अपने घोंसले में  अंडें नहीं मिले |दोनों को यह देखकर बहुत दुःख हुआ दोनों को समझ नहीं आ रहा था की अंडे किधर चले गए | उन्हें सक था कि पेड़ के नीचे रहने वाला सांप ही उनके  अंडे खा  गया होगा  परन्तु दोनों कुछ कर भी नहीं सकते थे | कुछ दिनों बाद कौवा की बीबी ने फिर अंडे दिये दोनों बहुत खुश थे इस बार कौवा ने निर्णय किया कि  खाना लेने वह अकेला ही जायेगा और उसकी पत्नी घर में रहकर अण्डों की रक्षा करेगी | कौवा के जाने के कुछ देर बाद पेड़ के नीचे रहने वाला सांप कौवा के घर के पास आता है और अंडे खाने के लिये आगे बढता है तो कौवा की पत्नी उसका विरोध करती है परन्तु वह उसे रोक नहीं पाती और सांप फिर अंडे खाकर चले जाता है |
कौवा जब घर लौटा तो उसकी पत्नी सारी घटना  कौवा को बतलाई | सारी बातें सुनकर कौवा को बहुत दुःख हुआ | कौवा इस बार वह सांप से बदला देने का प्रण  लेता है  | कौवा जनता था कि वह और उसकी पत्नी सांथ मिलकर भी सांप का कुछ नहीं कर सकते इसीलिये उसने चतुर  लोमड़ी से सहायता मांगी |
लोमड़ी बहुत चालाक थी उसने झट से कहा- '' सांप से तो मुझे भी बदला लेना है वह कई बार मुझे भी परेशान कर चुका है |''
लोमड़ी ने कौवा  को एक योजनाबतलाई |  योजना के अनुसार जब उस राज्य की राजकुमारी प्रतिदिन की भांती स्नान के लिये पास के तालाब में  आई और स्नान करने के पूर्व उसने अपना कीमती हार एक पत्थर पर रख दिया | उसी समय कौवा आया और राजकुमारी का हार उठा कर उड़ गया |
राजकुमारी अपने अंग रक्षकों को कौवा का पीछा  करने का आदेश देती है | कौवा अपनी योजनानुसार हार को सांप के बिल में डाल देता है | जब राजकुमारी के अंगरक्षक कौवा का पीछा करते-करते सांप के बिल के पास आते हैं तब उन्हें लगता है कि कौवा और सांप मिले हुए हैं इसी लिये कौवा सांप  के बिल में हार डाल गया है और अगर यह सांप जीवित रहा तो हार नहीं ले जाने देगा | राजकुमारी के सभी अंगरक्षक मिलकर उस सांप को मार देते  हैं |
इस तरह लोमड़ी की चालाकी से कौवा अपना बदला ले लेता है |अपना बदला पूरा होने पर  कौवा  चालाक लोमड़ी को धन्यबाद देता है और फिर कौवा और उसकी पत्नी शांति पूर्वक अपना जीवन जीने लगते है |

शिक्षा- '' कौवा , सांप और सोने के हार की कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि बुद्धिमानी और चालाकी से असंभव भी संभव किया जा सकता है |

चतुर ब्राम्हण और राक्षस की पंचतन्त्र कहानी | Chatur Bramhan Aur Rakshas Ki Panchtantra Kahanai -

CHATUR BRAMHAN AUR RAKSHAS KI KAHANI  चतुर ब्राम्हण और राक्षस की पंचतन्त्र  कहानी | Chatur Bramhan Aur Rakshas Ki Panchtantra Kahanai  -

बहुत पुरानी बात है एक गाँव में  एक वृक्ष के ऊपर   गंटक नाम का राक्षस रहता था  | एक बार की बात  है उस वृक्ष के नीचे से एक ब्राम्हण  गुजर रहा था तो राक्षस उसके कन्धों  पर जाकर बैठ गया |
राक्षस ब्राम्हण के कन्धों पर बैठते ही ब्राम्हण से कहने लगा  - ''  हे ब्राम्हण तुम मुझे पास के सरोवर तक ले चलो |''
ब्राम्हण के मन में विचार आया की यह स्वयं ही सरोवर तक जा सकता था तो मेरे कन्धों पर बैठ कर क्यूँ जा रहा है ?   ब्राम्हण ने डरते-डरते  पूछ लिया -''  तुम कौन  हो और मेरे कन्धों पर क्यूँ बैठे हो ?''
राक्षस बोला - '' मै एक राक्षस हूँ और  मेरा नाम गंटक है और तुम मुझे सरोवर तक ले चलो  नहीं तो मै तुम्हे खा जाऊंगा |''
ब्राम्हण ने राक्षस से पूछा-'' तुम खुद ही सरोवर तक क्यूँ नहीं चले जाते ?''
राक्षस बोला -''मैंने प्रण  लिया है की मैं गीले पैर जमीन  पर नहीं रखूँगा इसीलिये मैं तुम्हारे कन्धों पर बैठ कर जा रहा हूँ |''
ब्राम्हण उस राक्षस को सरोवर तक ले गया  जैसे ही दोनों सरोवर के पास पहुंचे राक्षस ब्राम्हण से बोला -'' अरे ब्राम्हण जब तक मैं इस सरोवर से नहाकर ना आ जून तुम कहीं मत जाना, नहीं तो मैं तुम्हे जीवित नहीं छोडूंगा  "''
जैसे ही राक्षस सरोवर में नहाने के लिया गया  ब्राम्हण ने सोचा की अगर यह राक्षस सरोवर से नहाकर आ जाता है तो पक्का ही यह मुझे खा लेगा और अगर मैं भागता हूँ तब भी यह मुझे दौड़ कर पकड़ लेगा और खा जायेगा | तभी ब्राम्हण को  एक बात की याद आई जो उसने बातों ही बातों में राक्षस से पूछ ली थी  कि राक्षस ने तो गीले पैर जमीन  पर नहीं रखने की कसम खाई है |
बस क्या था ब्राम्हण ने उस स्थान से दौड़ लगा दी और राक्षस उसे देखता ही रह गया क्यूंकि उसके पैर सरोवर मैं गीले हो गए थे और वह गीले पैर जमीं पर नहीं रख सकता था |

शिक्षा-'' पूछने में और शत्रू का  भेद लेने में क्या जाता है  ?''


दुष्ट बगुला और केकड़ा | Heron and crab story in hindi


bagula aur kekda kahani

दुष्ट बगुला और केकड़ा  | Heron and crab story in hindi -

बहुत समय पहले की बात है एक बगुला था वह धूर्त था  वह अब बूढ़ा हो गया था  | सरोवर के पास के सभी जीव-जंतु उसे बगुला दादा कहकर पुकारते थे | बगुला बूढ़ा होने के कारण  शिकार नहीं कर पा रहा था | एक बार भूख के कारण वह तालाब के  किनारे रो रहा था | एक केकड़े ने उस बगुले को रोते हुए देख लिया |
 केकड़ा बगुले के पास आया और उससे पूछने लगा - '' दादा बगुला क्या बात है आप बड़े परेशान लग रहे हो और रो भी रहे हो ?''
बगुला अगर केकड़े को सच बतला देता तो सरोवर के सारे जीव  बगुले का मजाक बना लेते |
 धूर्त बगुले के दिमाग में एक योजना आई उसने तत्काल केकड़े को उत्तर दिया - '' क्या बतलाऊं केकड़े भाई , मुझे अभी-अभी एक बहुत बड़े ज्योतिषी मिले थे वो मुझसे कहने लगे  कि आने वाले दो वर्ष के लिये इस क्षेत्र में अकाल पड़ेगा  उसमे यहाँ के सभी जीव जंतुओं  को खाने के लाले पड़ जायेंगें  और यह तालाब भी सूख  जायेगा | मै तो उड़कर कहीं और चला जाऊंगा परन्तु इस तालाब के सभी-जीव जंतु और मछलियों का क्या होगा ? यही सोच कर मैं रो रहा हूँ |
केकड़ा डर कर बोला - '' बगुला दादा आप तो सच कह रहे हैं इस सरोवर में तो बहुत कम पानी है यह तो जल्द ही समाप्त हो जायेगा , आप तो बहुत  बुजुर्ग और अनुभवी हो , आपने पहले भी इस तरह की मुसीबतों का सामना किया होगा , अब आप ही बतलाओ क्या करना चाहिये ?
बगुला कहने लगा -'' हाँ तुम सही कह रहे हो मैंने पहले भी  इस तरह की मुसीबतों का सामना किया है , मै तो उड़ कर कहीं दूसरे देश चला जाऊंगा परन्तु मुझे चिंता इस सरोवर में रहने वाले  जीवों की है जो हमेशा दुःख-सुख में मेरे सांथ रहे उन्हें मुसीबत के समय छोड़ कर कैसे चला जाऊं ?
केकड़ा बोला -'' आखिर हम कर भी क्या सकते हैं ?''
दुष्ट बगुले ने तत्काल जबाब दिया - '' यहाँ से कुछ मील दूर एक बहुत बड़ा सरोवर है , वह सरोवर इतना विशाल है की आने वाले दस वर्ष तक भी बारिश ना हो तो भी  नहीं सूखेगा |हम सभी को वहीँ चलना चाहिये |''
केकड़ा भी बगुले की बात से सहमत हो गया और अकाल आने की खबर सरोवर के आस-पास  जंगल में आग की तरह फ़ैल गई | सरोवर के सभी जीव बगुले की बातों में आ गए और मुसीबत से बचने की सलाह लेने लगे |
बगुला ने सभी से कहा -'' अभी अकाल पड़ने में समय है तब तक सरोवर के सारे जीवों को मैं अपनी पीठ पर बैठाकर बड़े तालाब तक ले जाऊंगा और अकाल आते-आते इस सरोवर के सारे जीवों को  बड़े तालाब में पहुंचा दूंगा |
सरोवर के सभी जीव बगुले की बातों में आकार तालाब छोड़कर दूसरे  तालाब में जाने के लिये तैयार हो गए | दुष्ट बगुला भी यही चाहता था | ''
दुष्ट बगुला  प्रतिदिन किसी ना किसी जीव को  तालाब से अपनी पीठ पर बैठाकर ले जाता और एक पहाड़ी पर गिराकर उसे मार देता और खा जाता था | कई दिनों तक  बगुला इसी तरह मछलियों और तालाब के दूसरे  जीवों को मार देता और खा जाता था और मौज से अपना जीवन जी रहा था |
एक दिन केकड़ा बगुले के पास पहुंचा और बोला -'' बगुला दादा  सबसे पहले अकाल के बारे में अपनी चर्चा हुई थी , अभी तक आपने कई मछलियों और जीवों को बड़े सरोवर भेज दिया है परन्तु मुझे अभी तक नहीं भेजा है ,कृपया मुझे भी जल्द से जल्द वहां भेज दें |''
बगुला भी सोचने लगा कि कई दिनों से मछलियाँ खा रहा हूँ क्यूँ ना आब केकड़े का स्वाद चखा जाये | बगुला तत्काल तैयार हो गया | केकड़ा बगुले की पीठ पर सवार हो गया | जब दोनों उस पहाड़ के पास पहुंचे जिधर बगुला मछलियों और दुसरे जीवों को गिराकर मार देता था तभी केकड़े की नजर हड्डियों के ढेर पर पड़ी केकड़े को तत्काल सारी कहानी समाज आ गई |
तभी बगुला बोला-'' अरे केकड़े तुम्हारी कोई आखिरी इच्छा हो तो कहो अब मैं तुम्हें यहाँ से गिराकर मार दूंगा और अपना पेट भरूँगा |''
केकड़े ने तत्काल अपने पैने डंक दुष्ट बगुले  की गर्दन में गड़ा  दिए | बगुला जैसे तैसे पहाड़ी पर उतरा परन्तु तब तक उसके प्राण पखेरू उड़ गए |
केकड़ा धीरे-धीरे वापस अपने सरोवर आ गया जब सरोवर के दुसरे जीवों ने बगुला के बारे में पूछा तब केकड़े ने सारी बात बतला दी | तालाब के सारे जीवों को अपनी गलती का पछतावा हुआ |

शिक्षा -  बुराई का अंत बुरा ही होता है |

प्यासा कौवा कहानी | Thirsty Crow Story in Hindi


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Thirsty Crow Story in Hindi

प्यासा कौवा कहानी  | Thirsty Crow Story in Hindi -

बहुत समय पहले की बात है गर्मी के दिन थे |   एक कौवा था उसे बहुत जोरों की प्यास लगी थी | वह गर्मी के दिनों में पानी की तलाश में  उड़ रहा था लगातार उड़ने के कारण  कौवा  की प्यास और अधिक बढती जा रही थी |  प्यास के कारण उसका बहुत बुरा हाल था |
तभी अचानक प्यासे  कौवा को  एक जगह पानी का मटका दिखलाई दिया | वह अपनी प्यास मिटाने के लिये उस मटके के पास उतर गया | कौआ ने देखा कि मटके में बहुत कम पानी है  | कौवा ने  मटके से पानी पीने का प्रयत्न किया परन्तु कौआ की चोंच पानी तक नहीं पहुँच पा रही थी |  कौवा बहुत प्यासा था पानी तो उसके सामने था पर वह उसे पी नहीं पा रहा था |  कौवा को कुछ समझ नहीं आ रहा था की वह क्या करे ?
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 उसने आस-पास देखा कहीं और पानी मिल जाये परन्तु उस मटके के  सिवा कहीं  और पानी नहीं था | अब कौआ सोचने लगा की क्या किया जाये कि इस पानी तक मेरी चोंच पहुँच जाये  ?
तभी उसे पास में कुछ कंकड़ और पत्थर दिखलाई दिये  | प्यासे  कौवा के दिमाग में एक उपाय सूझा उसने सोचा की अगर मैं ये कंकड़ मटके में डाल  दूँ तो पानी ऊपर आ जायेगा और मैं अपनी प्यास मिटा सकता हूँ  | 
अब क्या था कौआ एक-एक कर कंकड़ उठाता और मटके में डाल  देता | कौवा जैसे जैसे मटके में कंकड़ डालता मटके का पानी धीरे-धीरे ऊपर आने लगा | अब  कौवा का होंसला बढ़ने लगा | वह मटके में तेजी से कंकड़ डालने लगा  |  कौवा की मेंहनत रंग लाई और मटके का पानी ऊपर आ गया |  कौवा ने जी भर पानी पिया और अपनी प्यास मिटाई |
शिक्षा- '' प्यासा कौवा कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि सूझ-बूझ  और धैर्य से कठिन कार्य भी आसानी से किया जा सकता हैं और विपत्ति से छुटकारा पाया जा सकता है |''

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