खरगोश और कछुआ की कहानी | Rabbit and Tortoise Story in Hindi -

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 खरगोश और कछुआ की कहानी | Rabbit and Tortoise Story In Hindi -

बहुत समय पहले की बात है एक बहुत ही खुबसूरत जंगल था | जंगल में सभी जानवर बहुत ही हंसी -खुशी रहते  थे और दिन भर मौज मस्ती करते थे | उस जंगल में एक खरगोश और एक कछुआ भी रहते थे , दोनों में अच्छी दोस्ती थी | खरगोश बहुत तेज दौड़ता था और कछुआ बहुत ही धीमी  चाल से चलता था |  खरगोश को अपनी तेज चाल  का बहुत घमण्ड था और वह हमेशा ही कछुये का मजाक उड़ाया करता था | कछुआ भी खरगोश की बात का बुरा नहीं मानता था |
एक बार की बात है , खरगोश अपने मित्र कछुआ से बोला- ''मित्र , क्या तुम मेरे सांथ दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेना  चाहोगे |''
कछुआ बोला- ' मित्र खरगोश जैसी तुम्हारी मर्जी , अगर तुम दौड़ प्रतियोगिता करना चाहते हो तो ठीक है मुझे को आपत्ति नहीं है  | ''
जंगल के जानवरों ने बड़े जोर-शोर से दौड़ प्रतियोगिता की तैयारियां शुरू कर दी | खरगोश  और कछुआ की दौड़ प्रतियोगिता शुरू होने वाली थी | जंगल के सभी जानवर प्रतियोगिता देखने के लिये आ गए | दौड़ के लिये  एक पहाड़ी पर जाना था जो पहले पहाड़ी पर पहुचेगा वही जीतेगा | जंगल के सभी जानवर जानते थे की खरगोश तेज दौड़ता है उन्हें उम्मीद थी की खरगोश ही यह दौड़ जीतेगा |
दौड़ प्रारम्भ की गई | खरगोश ने शुरू से ही तेज दौड़ने लगा और कुछ ही देर में वह कछुआ से बहुत आगे निकल गया | खरगोश एक छायादार पेड़ के नीचे पहुंचा और  पीछे मुड़कर देखा तो उसे कछुआ कहीं नहीं दिखा | ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी खरगोश ने सोचा कछुआ तो अभी बहुत दूर है क्यूँ ना थोड़ी देर इस पेड़ की छाया में आराम कर लूँ ?
खरगोश ने जैसे ही आखें बंद की उसे नींद लग गई | कुछ देर में कछुआ भी वहीँ पहुँच गया और वह खरगोश को देखकर आगे बढ़ गया | बहुत देर बाद अचानक खरगोश की नींद खुली उसने आगे-पीछे देखा उसे कहा दिखलाई नहीं दिया  |  कुछ देर बाद उसने देखा की कछुआ पहाड़ी पर पहुँचने वाला है | खरगोश अपनी पूरी शक्ति लगाकर दौड़ा परन्तु उसके पहाड़ी पर पहुँचने के पहले ही कछुआ पहाड़ी पर पहुँच चुका था और कछुआ ने यह दौड़ जीत ली |
खरगोश अपनी गलती और अभिमान पर बहुत  पछताया और उसने कछुआ की हंसी उड़ाने  पर कछुआ से माफ़ी मांगी |

शिक्षा- ' हमें कभी भी अपने गुणों पर अभिमान नहीं करना चाहिये |''

रंगा सियार - पंचतन्त्र की कहानी | Ranga Siyar - Panchtantra Kahani


रंगा सियार - पंचतन्त्र की कहानी 

बहुत समय पहले की बात है एक जंगल में शातिर  सियार रहता था | एक बार जंगल में बहुत ही भयानक आंधी-तूफ़ान आया | इस आंधी में एक बड़ा पेड़ गिरने से सियार दब कर घायल हो गया वह किसी तरह बचता-बचाता अपनी गुफा में पहुँच गया और कुछ दिनों बाद जब स्वस्थ होने के पश्चात अपनी गुफा से बाहर निकला |कई दिनों तक खाना ना मिलने के कारण बहुत कमजोर हो गया था | गुफा से निकलने के बाद उसने खरगोश,तीतर,और कई छोटे जानवरों का शिकार करने का प्रयत्न किया परन्तु शरीर दुर्बल हो जाने के कारण वह जल्दी थक जाता था और शिकार नहीं कर पाया | उसने सोचा ऐसे तो मैं भूखा ही मर जाऊंगा | सियार आसन शिकार की तलास में मानव बस्ती की घुस गया  उसने सोचा की कोई मुर्गी या किसी जानवर का बच्चा हाँथ लग जायेगा |यह सोचकर वह गाँव की गलियों में शिकार की तलास में घूमने  लगा | गाँव के कुत्तों ने सियार को देख लिया और भौंकते हुए उसके पीछे पड़ गये| कहाँ सियार आया था शिकार करने और अब सियार की जान पर बन आई | धीरे-धीरे कुत्तों की टोली बढती जा रही थी सियार गली-कुचों में जान बचाकरभाग रहा था परन्तु दुर्बल शरीर के कारण वह बुरी तरह थक गया था | भागते -भागते वह कपडा रंगने वालों (रंगरेजों ) की बस्ती में पहुँच गया | वहां एक घर के आगे एक टैंक था सियार ने जान बचाने के लियेटैंक में छलांग लगा दी | रंगरेज ने उस टैंक  में कपड़ा रंगने के लिये रंग घोल रखा था | सियार सपनी साँस रोक कर टेंक में डूबा रहा | कुत्तों की टोली आगे निकल गई |
सियार साँस लेने के लिये ही अपना मुँह बहार निकलता था | सियार को जब विश्वास हो गया की कुत्तों की टोली आगे निकल गई  तब उसने आस-पास देखा और चुपके से टैंक से बाहर आकर जंगल में भाग गया | टैंक में घोले गए नीले रंग के कारण सियार का पूरा शरीर रंग गया था और सियार का पूरा शरीर नीले रंग का दिखलाई देने लगा | जंगल का जो भी जानवर सियार को देखता वह उसके इस अनोखे नीले रंग को देख कर डर जाता था | जंगल के दूसरे जानवरों को इस तरह डरता देख कर सियार के दिमाग में एक योजना आई | नीले  रंग के उस रंगा सियार ने भागते हुए जानवरों को रोका और कहा -'' आप सब भागो  नहीं और मेरी बात सुनो |''
नीले रंग के रंगा सियार की बातें सुनकर जंगल के सभी जानवर रुक गए | रंगा सियार बोला-'' आप सभी मुझसे डरें  नहीं , आपने मेरे जैसा रंग कभी किसी दूसरे जानवर का नहीं देखा होगा , मुझे   भगवान  ने यह अनोखा रंग प्रधान किया है , आप जंगल के सभी जानवरों को बुलाकर लाओ , आप सभी के लिये भगवान  ने सन्देश भिजवाया है |''
उस नीले रंग के रंगा सियार की बातों में आकर उस जगह जंगल के सभी जानवर आ गए | नीले रंग का रंगा सियार एक ऊँचे पत्थर पर चढ़ गया और सभी जानवरों को संबोधित करके बोला- '' मेरा नाम  ककुदुम है , आप सभी के लिये भगवान  ने एक सन्देश भेजा  है | भगवान  ने मुझे यह अनोखा रंग प्रदान कर पृथ्वी पर जाने का आदेश दिया  और पर्थ्वी पर जानवरों का कोई भी सर्वमान्य शासक ना होने के कारण मुझे यहाँ का शासक बनाकर भेजा है |आप सभी मुझे  सम्राट ककुदुम के नाम से जानोगे | अब आप अनाथ नहीं रहे , आप सभी निर्भय होकर जंगल में घूम सकते हो | ''
सभी जानवर रंगा सियार के नीले रंग को देखकर उसकी बातों में आ गए यहाँ तक शेर और बाघ की भी इतनी हिम्मत नहीं हुई की उसकी बातों को काट सकें | जंगल के सभी जानवर नीले रंग के रंगा सियार सम्राट ककुदुम के आगे नतमस्तक हो गए और सर्वसम्मति से उसे अपना राजा चुन लिया |
सम्राट ककुदुम ने जंगल के सभी जानवरों को उनकी जिम्मेदारियां दे दी | उसनेहांथी को  अपना सेनापति बनाया , शेर और बाघ को अपना अंगरक्षक नियुक्त किया |अब रंगा सियार सम्राट ककुदुम  के राजसी ठाठ हो गए वह जिधर भी जाता शेर और बाघ उसके आजू-बाजू चलते और हांथी अपनी सूंड से चिंघाड़कर सभी को महाराज के आने की सुचना देता , भालू पंखा झुलाता था |रोज उसके लिये राजसी भोजन परोसा जाता और वह जंगल में जिधर भी जाता उसका बड़ा  मान सम्मान होता |  रंगा सियार  सम्राट ककुदुम प्रतिदिन ऊँचे पत्थर पर बैठकर अपना दरवार लेता था |
 रंगा सियार  सम्राट ककुदुम  जानता  था की अगर उसके जात  भाई दूसरे सियार इस जंगल में रहे तो वो उसे अवश्य पहचान लेंगे | इसी कारण उसने सम्राट बनते ही दूसरे सियारों को जंगल से निकलवा दिया |
एक दिन सम्राट ककुदुम अपनी गुफा में आराम कर रहा था | बाहर चाँद निकला था और दूधिया रौशनी थी | नीला सियार सुहानी रात में बाहर निकला  पास के जंगल से सियारों की टोली ' हू हू हू --' की आवाज निकाल रही थी | उस '  हू हू हू --' की आवाज को सुनकर नीला रंगा सियार अपना आपा खो बैठा और उसके अन्दर के जन्मजात  सियारों वाली आदत ने जोर मारा और वह भी चाँद की ओर मुँह ऊँचा कर ' हू हू हू --' की आवाज  निकालने लगा |''
सिंह और बाघ ने उसे 'हू हू हू --' की आवाज  निकालते देख लिया | सिंह बोला- ''अरे यह तो धूर्त रंगा सियार है , इसने हमें दोखा दिया और खुद सम्राट बन कर मौज उड़ा रहा है , चलो अभी इसे सबक सिखाते हैं |''
फिर क्या था सिंह  और बाघ ने मिलकर रंगा सियार को मार डाला |

शिक्षा- 

'' किसी को धोखा नहीं देना चाहिये , बेईमानी का फल बुरा होता है | "

ईमानदारी का फल मीठा होता है -हिंदी कहानी | Imandari ka fal


IMANDARI KA FAL - HINDI KAHANI

ईमानदारी का फल मीठा होता है  -हिंदी कहानी

बहुत समय पहले की बात है  एक राज्यमें एक धनवान  और प्रतिष्ठित व्यक्ति व्यक्ति रहता था | एक बार उसके राज्य  में अकाल पड़ा | चारो तरफ लोग भूख से मर रहे थे पशु पक्षी भी भूख-प्यास से तड़प रहे थे | ऐसी
स्थित में राज्य के उस  धनवान  व्यक्ति ने बच्चों के लिये प्रतिदिन एक रोटी देने का निश्चय किया और चारो तरफ घोषणा करवा दी |
 दूसरे दिन सुबह  से ही उस  व्यक्ति के घर के सामने बच्चों की भीड़ लग गई | वह व्यक्ति अपने हांथों से बच्चों को रोटी बांटने लगा | रोटियां बड़ी-छोटी थीं | सभी बच्चे बड़ी रोटियां लेना चाह रहे थे इसिलए बच्चे आपस में धक्का मुक्की करने लगे | उस धनि व्यक्ति ने देखा एक छोटी बच्ची एक तरफ़ा चुपचाप खड़ी होकर अपनी बारी आने का इंतजार कर रही थी और जब सभी बच्चों  को रोटियां बंट गई उस लड़की रोटी लेने के लिये आगे बढ़ी | उस बच्ची के लिये एक ही रोटी बची थी वह भी छोटी रोटी थी | बच्ची ने खुशी-खुशी रोटी ले ली और अपने घर चली गई |
दूसरे दिन उस धनि व्यक्ति ने पुनः रोटियां बांटी सभी बच्चों ने फिर रोटियां ली और इस बार भी उस छोटी बच्ची को सबसे आखिरी  में छोटी रोटी ही मिली | कई दिनों तक यह क्रम चलता रहा वह धनवान व्यक्ति रोज इस दृश्य को देखता था | एक दिन बच्ची  रोटी अपने घर ले गई और जब उसने रोटी तोड़ी  तो उसमें सोने का सिक्का मिला | उस बच्ची ने अपनी माँ को सिक्का दिखलाया | उसकी माँ ने सिक्के को धनवान व्यक्ति को वापस करने के लिये कहा |
बच्ची अगले दिन रोटी लेने गई और उस धनि व्यक्ति को सिक्का लौटकर   बोली -'' मुझे रोटी में यह सोने का सिक्का मिला है शायद रोटी बनाते समय आंटे  में गिर गया होगा इसी कारण मैं इस सोने के सिक्के को लौटने आई हूँ |''
उस नन्ही सी बच्ची की बातें सुनकर वह व्यक्ति बहुत खुश हुआ और सोने का सिक्का बच्ची को वापस कर  बोला-बेटी , यह सोने का सिक्का तुम्हारे धेर्य और संतोष का ईनाम है |''
बच्ची बोली- '' मुझे रोटी लेने के लिये धक्के नहीं खाने पड़े यही मेरे लिये ईनाम है मैं इसी में खुश हूँ |''
दरअसल उस धनवान व्यक्ति ने जानबूझ का उस रोटी में सोने का सिक्का डाला था | बच्ची की ईमानदारी देखकर उसने बच्ची को अपनी पुत्री के समान दर्जा दिया |
शिक्षा- '' जो व्यक्ति अनावश्यक लालच नहीं करता और संतोषी जीवन जीता है वह जीवन में हमेशा खुश रहता है |''

सच्चा संत और प्यासा गधा | Sacha Sant Aur Pyasa Gadha -


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सच्चा संत और प्यासा गधा | Sacha Sant Aur Pyasa Gadha -

एक महान संत थे , वे बहुत ही परोपकारी और शांत स्वभाव के थे | एक बार उनके मन में गंगा स्नान करने और गंगा जल को कावड़  में ले जाकर काशी विश्वनाथ भगवान के मंदिर में अर्पित करने का विचार आया | उन्होंने अपने साथियों और शिष्यों  को अपने विचार से अवगत कराया | उनके सभी सांथी और शिष्य  भी गंगा स्नान के लिये निकल पड़े |
गंगा जी पहुंचकर सभी ने जी भर कर गंगा स्नान किया और कावड़  में गंगा जल लेकर काशी विश्वनाथ मंदिर के लिये चल पड़े | जब वे मंदिर पहुँचने वाले थे की रास्ते में उन्हें एक गधा दिखलाई दिया | गधा प्यास से तड़प रहा था और चारो तरफ पानी के लिये भटक रहा था | गधे की हालत देख सभी  को उस पर दया आ रही थी परन्तु कावड़ का जल काशी विश्वनाथ जी के लिये था | इसी कारण वे चाह कर भी उस प्यासे गधे को पानी नहीं पिला पा रहे थे |
परन्तु उस महान संत ने बिना कुछ विचार  किये  अपने कावड़ के जल से उस प्यासे गधे की प्यास बुझाई और उसे नवजीवन प्रदान किया | गधा भी पानी पीकर पुनः उठ  खड़ा हुआ और घास चरने लगा |
संत के शिष्यों ने कहा - '' गुरु जी  आपने कावड़ का जल गधे को पिलाकर उसे नवजीवन प्रदान किया है परन्तु अब आप काशी विश्वनाथ जी को जल चडाने से वंचित रह गए |''
संत ने कहा- '' सभी प्राणियों में ईश्वर का अंश होता है और इस गधे को कावड का पानी पिलाकर उसे नव जीवन देने के कारण काशी विश्वनाथ भगवान को भी  ख़ुशी हुई होगी | इसीलिये मुझे  काशी विश्वनाथ भगवान् को जल चडाने के समान ही पुण्य प्राप्त हुआ |
सभी संतों और शिष्यों ने उन्हें श्रध्दाभाव से नमन किया |

शिक्षा- '' हर जीव में ईश्वर का वास होता है और परोपकार से बढकर को धर्म नहीं होता |''

हिरण ,कछुआ , चूहा और कौए की मित्रता की कहानी | Deer, Tortoise, Rat and Crow frendship story


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हिरण ,कछुआ , चूहा और कौए की मित्रता की कहानी | Deer, Tortoise, Rat and Crow frendship story -

बहुत पुरानी  बात है एक जंगल में  चूहा, कछुआ, कौआ और हिरण चार मित्र रहते थे | चूहे का नाम हिरण्यक ,कछुये का नाम मंथरक, कौआ का नाम लघुपतनक और हिरण का नाम चित्रांग था | उन चारो में बड़ी पक्की दोस्ती थी | चारो आपस में बड़े मौज  से रहते थे | एक दिन की बात है हिरन जंगल गया परन्तु बहुत  देर हो गई वापस नहीं आया | तीनो मित्रों को हिरन की बहुत चिंता होने लगी | कछुआ और चूहे ने कौए से कहा - '' मित्र तुम आसमान में उड़ सकते हो जाकर हिरण को देखो वह किस हाल में है |''

हिरण का शिकारी के जाल में फंसना -

 

लघुपतनक नामक कौआ हिरन को देखने के लिये उड़ गया बहुत दूर जाकर उसने देखा की उसका मित्र हिरन शिकारी द्वारा फैलाये गए जाल में फंस गया है | कौया तुरन्त ही हिरन के पास पहुंचा और  हिरन से कहा-'' मित्र तुम तो नीतिशास्त्र के ज्ञाता हो फिर इस जाल में कैसे फंस गए , तुम्हारी यह हालत कैसे हुई |''
इस पर हिरण कहने लगा- '' मित्र मुझे शिकारी ने छल से इस जाल में फंसा लिया, यह अच्छा हुआ की मुझे अपने अंतिम समय में आप के दर्शन हो गए |''
कौआ बोला- '' मित्र तुम चिंता मत करो मैं अभी अपने मित्र चूहे को लेकर आता हूँ वह जल्द ही इस जाल को काट देगा और तुम फिर से स्वतंत्र जीवन जी सकोगे और हम सब मिलकर फिर से मजे करेंगे |''
कौआ वापस लौटा और शीघ्र ही चूहे को अपनी पीठ पर बैठा कर हिरन के पास ले आया | चूहे ने हिरण से उसका हाल-चाल जाना और जाल काटना शुरू कर दिया | चूहा अभी जाल कट ही रहा था कि  कौआ वृक्ष के ऊपर से बोला-'' लो ये यहाँ क्यूँ आ रहा है ? , इसे यहाँ नहीं आना चाहिये था |''
इस पर हिरण ने पूछा -" क्या हुआ शिकारी आ रहा है क्या ?''
हिरण की बात सुनकर कौआ बोला-'' शिकारी नहीं , अपितु अपना मित्र मंथरक कछुआ आ रहा है |''
चूहा कहने लगा -'' यह तो अच्छी बात है , इसमें इतना परेशान क्यूँ हो रहे हो ? ''
कौए  ने जवाब दिया- '' मित्र अगर शिकारी आ जाता है तो मैं तो उड़ जाऊंगा, तुम बिल में चले जाओगे और हिरन जंगल में घुस जायेगा परन्तु कछुआ तेजी से भाग नहीं सकता उसे शिकारी पकड़ लेगा  |''
जल्द ही चूहे ने हिरण के जाल को काट दिया | इतनी देर में कछुआ भी तीनो मित्रों के पास पहुँच गया | कछुये को पास आया देखकर हिरन बोला-'' मित्र तुम यहाँ क्यूँ आये हो, शिकारी आता ही होगा तुम जल्द ही वापस लौट जाओ |''
कछुआ बोला- '' वह मित्र भी किस काम का जो अपने मित्र को विपत्ति में अकेला छोड़ दे , मुझसे अकेला रहा नहीं गया | सोचा , विपत्ति में कुछ मदद कर सका तो करूँगा |''
चारो मित्र बातें कर ही रहे थे तभी उन्हें दूर से शिकारी (बहेलिया) आता हुआ दिखा | शिकारी को देखकर  कौआ उड़कर बृक्ष पर बैठ गया , चूहा नजदीकी बिल में घुस गया और हिरण दौड़कर जंगल में चला गया और कछुआ छुपने के लिये जगह देखने लगा |
जैसे ही शिकारी उस स्थान पर आया उसने देखा की जाल कटा हुआ है और हिरन वहां से भाग गया |

कछुए का शिकारी के जाल में फंसना-

 

शिकारी दुखी होकर जाने लगा | जाते-जाते उसे रास्ते  में कछुआ दिखा उसने सोचा आज हिरण तो मिला नहीं, क्यूँ ना इस कछुये को लेकर चलूँ | शिकारी (बहेलिया) उसे अपनी पोटली में डालकर ले जाने लगा | पेड़ पर बैठा-बैठा कौआ यह सब देख रहा था |
शिकारी के वहां से जाते ही हिरण और चूहा भी उसी स्थान पर बहुंच गए | कौए ने दोनों को यह बात बतलाई | कछुये के बारे में सुनकर अब तीनो बहुत दुखी हुए  | चूहा बोला-'' मित्र इसी तरह दुखी होने से कुछ नहीं होगा हमें किसी न किसी तरह अपने मित्र कछुये को बचाना ही होगा|''
कौआ बोला -'' मेरे दिमाग में एक योजना है , मैं जैसा बोलूं  आप सभी वैसा ही करना |'' इतना बोलकर कौए ने सभी के कानो में कुछ कहा और सभी अपने-अपने काम से लग गए |
योजना के अनुसार शिकारी  के आगे एक तालाब  के किनारे हिरन इस तरह लेट गया मानो मर गया हो  और कौआ उसके सिर पर बैठ कर धीरे-धीरे चोंच मरने लगा | जैसे ही शिकारी ने हिरन को देखा वह उसे मरा हुआ समझकर सोचने लगा अब मुझे कछुआ तो मिल चुका है इस मारे हुए हिरन को भी लिये चलता हूँ ऐसा  विचार कर  उसने  कछुये वाली पोटरी जमीन पर रख दी और हिरण के पास जाने लगा | उसी समय चूहा अपने मित्र कछुये को मुक्त करने के लिये उसके नजदीक  जाकर पोटरी को काटने लगा और कुछ ही देर में कछुआ मुक्त हो गया और योजनानुसार कछुआ तालाब में चला गया | इधर जैसे ही शिकारी हिरण के नजदीक पहुंचा हिरन तुरन्त उठकर छलांगें मारता हुआ जंगल में चला गया और कौआ भी उड़ गया |
यह देखकर शिकारी हैरान रह गया और वापस उसी स्थान पर लौट आया उसने देखा की उसकी पोटरी कटी हुई है और उसमे कछुआ भी नहीं है | शिकारी ने आस पास देखा परन्तु कछुआ कहीं  नहीं था वह समझ गया की कछुआ तालाब में चला गया है | शिकारी उदास होकर अपने घर चला गया |
इधर चारो मित्र खुशी से फूले नहीं समां रहे थे चारो ने अपनी मित्रता के दम पर दो बार शिकारी को मात दी और अपने मित्रों की जान बचाई | इसी कारण कहा गया है जीवन में अच्छे मित्रों का सांथ हो तो बड़ी से बड़ी कठिनाई से मुक्ति पाई जा सकती है |

शिक्षा-  मित्रता में बड़ी शक्ति होती है जीवन में हमेशा अच्छे मित्रो को पाने का प्रयत्न करते रहना चाहिये |

पंचतन्त्र कहानियां | Panchtantra story in Hindi -

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 पंचतन्त्र कहानियां | Panchtanta ki Kahaniya in Hindi Online -

पंचतन्त्र के कहानियों की रचना लगभग दो हजार साल पूर्व आचार्य विष्णु शर्मा द्वारा की गई थी | पंचतन्त्र की कहानियों को पांच तंत्रों अर्थात भागों में बांटा गया है इसीलिये कहानियों के इस संग्रह को पंचतन्त्र कहा जाता है | आज नीतिकथाओं में पंचतन्त्र की कहानियों को प्रथम स्थान प्राप्त है इसी कारण अभी तक विश्व की लगभग 50 भाषाओँ में इनका अनुवाद किया जा चुका है | पंडित विष्णु शर्मा ने पंचतन्त्र की रचना क्यूँ की इसके संबंध में नीचे दी गई कथा प्रचलित है -

 पंचतन्त्र की रचना (निर्माण) की कथा  -


प्राचीन समय की बात है एक राजा हुआ करते थे जिनका नाम अमरशक्ति था उनकी राजधानी महिलारोप्य नामक नगर था | राजा अमर शक्ति बहुत ही योग्य, वीर, न्यायप्रिय और दानवीर थे  उनके तीन पुत्र बहुशक्ति, उग्रशक्ति और अनन्तशक्ति थे | राजा के तीनो पुत्र मूर्ख और बेकार के कार्यों में अपना समय बर्बाद करते थे | राजा ने उन्हें बहुत अच्छी शिक्षा देने का प्रयत्न किया परन्तु तीनो ने पढाई –लिखाई में कोई रूचि नहीं ली | राजा अपने पुत्रों की मुर्खता और निकम्मेंपन से बहुत परेशान थे | अब राजा बहुत चिंतित रहने लगे उन्हें डर सताने लगा कि उनके जाने के बाद उनके राज-पाठ का क्या होगा | उनके बेवकूफ पुत्र तो कुछ ही दिनों में राज्य को  नष्ट कर देंगें | उनके तीनो पुत्रों में कोई भी ऐसा नहीं था जो राज्य का भार अपने कन्धों पर उठा सके | राजा अमरशक्ति के राज्य में कई योग्य शास्त्रों में पारंगत और निपुण शिक्षक थे परन्तु उनमे से कोई भी ऐसा नहीं था जो उन तीनों को शिक्षित कर सके | राजा के एक बहुत ही योग्य मंत्री थे जिनका नाम सुमति था उन्होनें राजा को नीतिशास्त्र में पारंगत और सर्वगुण सम्पन्न आचार्य विष्णु शर्मा के बारे में बतलाया | राजा अमरशक्ति ने आचार्य विष्णु शर्मा से मिलकर अपने पुत्रों को शिक्षा देने का अनुरोध किया और कहा –‘’ अगर आप मेरे पुत्रों को अल्प-अवधि में शिक्षित कर राजनीति में पारंगत कर देंगे तो मै  आपको 100 गाँव और मुहं  माँगा इनाम दूंगा |’’
राजा की बात सुनकर आचार्य विष्णु शर्मा को हंसी आ गई और उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा-‘’ राजन मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूँ , मैं सरस्वती का उपासक हूँ और मुझे धन –माया से कोई लगाव नहीं है , परन्तु इस राज्य की भलाई के लिये मैं छः माह के अन्दर आपके पुत्रों को शिक्षा देकर उन्हें कुशल राजनीतिज्ञ बना दूंगा |”
राजा ने आचार्य विष्णु-शर्मा की बातें सुनकर अपने पुत्र उन्हें सोंप दिए और आचार्य विष्णु शर्मा उन्हें अपने आश्रम ले गये जिधर उन्होंने  राजपुत्रों को शिक्षित करने के लिये कई कहानियों की रचना की | इन कहानियों को मनुष्य के अतिरिक्त जंगल के जानवरों के पात्रों के माध्यम से रुचिपूर्ण बनाया गया | कहानियों में मनोविज्ञान , राजनीति और व्यवहारनीति की बातें थीं | इन कहानियों को पांच भागों में बनाया गया है इसीलिये कहानियों के इस संग्रह को पंचतन्त्र कहा जाता है |
पंचतन्त्र की  कहानियों को सुनकर राजा अमर शक्ति के तीनो पुत्र जल्द ही  कुशल राजनीतिय बन गये | जो भी व्यक्ति पंचतन्त्र की कहानियों के बारे में जानता है वो जीवन में सफलता पाता  है | इसी कारण लोग अपने बच्चों को पंचतन्त्र की कहानियं सुनाते हैं ताकि वो भो नीतिकुशल और व्यवहार कुशल बन सकें और जीवन में सफतला प्राप्त कर सकें |

पंचतन्त्र के भाग (भेद )-  

 

पंचतन्त्र को पांच तंत्रों अर्थात भागों में बनता गया है ये हैं-
[1] मित्रभेद –
 मित्रों में मनमुटाव और अलगाव की कहानियां | इसमें पिंगलक नामक शेर और संजीवक नामक  बैल की दोस्ती में दुष्ट सियार द्वारा शत्रुता उत्पन्न करने का वर्णन है |
[2] मित्रसम्प्राप्ति ( मित्रलाभ ) –
 योग्य मित्र मिलने पर उसके लाभ | इसमें कौआ ,हिरन , चूहा और कछुआ अपनी मित्रता के कारण एक दूसरे पर आए संकटों  से मुक्ति पातें हैं और आपसी मित्रता का सुख भोगते हैं |
[3] काकोलुकीयम् –
 कौवे और उल्लुओं की कहानियां | इसमें बतलाया गया है की जो व्यक्ति शत्रू और रोग की उपेक्षा करता है उसका अंत निकट होता है |
[4] लब्धप्रणाश – 
हाँथ में आई वस्तु का हाँथ से निकल जाना | इसमें वानर और मगरमच्छ की कहानी है जिसमें वानर अपनी की चतुराई से जान बचा लेता है और मगर के हाँथ  आया भोजन निकल जाता है |
[5] अपरीक्षित कारक – 
किसी भी कार्य को बिना सोच-विचार के हड़बड़ी में नहीं करना चाहिये , जिसके बारे में परखा न गया हो उसे करने के पहले सावधानी रखना चाहिये | इसमें नेवला ब्राम्हण के पुत्र की रक्षा करता है और ब्राम्हण की पत्नी बिना सोचे विचार किये नेवले को मार कर  पछताती है | इन पांचो पागों में ऊपर दी गई कहानियों के अतिरिक्त भी कई कहानियां हैं |
इसी प्रकार पंचतन्त्र के प्रत्येक भाग ( अंक ) में कई नीतिपरक और व्यावहारिक कथायें दी गई हैं | पंचतन्त्र की रचना 300 ईसापूर्व (लगभग 2300 वर्ष पूर्व ) मानी गई हैं परन्तु इसिहसकार इसमें एक राय नहीं है उनके अनुसार यह समय आगे-पीछे हो सकता है | अब इसकी मूल प्रति प्राप्त नहीं हैं पंचतन्त्र के कहानियों को अलग अलग स्त्रोतों से एकत्र किया गया है | पंचतन्त्र की कहानियों की मनोविज्ञान , राजनीति और व्यवहारनीति की बातें आज भी व्यावहारिक है और इसी कारण लोग अपने बच्चों को पंचतन्त्र की कहानियां सुनते हैं |
पंचतन्त्र की कुछ प्रमुख कहानियां निम्नानुसार हैं-
[1] शेर और चालाक खरगोश
[2] कबूतर और शिकारी  (एकता की शक्ति )
[3]बन्दर और मूर्ख  मगरमच्छ 
[4] बोलने वाली गुफा  
[5] मित्रता की शक्ति  
[6]  रंगा सियार

शेर और चूहा की कहानी | Sher Aur Chuha Ki Kahani


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शेर और चूहा की  कहानी  | Sher Aur Chuha Ki Kahani -

बहुत समय पहले की बात है एक घनघोर जंगल था | उस जंगल का राजा एक शक्तिशाली शेर था | शेर दिन में अपना शिकार करता और फिर अपनी गुफा में आकार आराम से  सो जाता था | शेर की गुफा के पास ही एक नन्हा सा चूहा रहता था वह बहुत ही सुन्दर और शरारती था | एक दिन की बात है शेर शिकार करके अपनी गुफा आया और आराम से सो गया | दिन का समय था | उसी समय नन्हा सा चूहा अपने बिल से निकला और शेर के पास घुमने लगा | चूहे को शरारत सूझी और वह शेर के पास पहुंचा और उचल कूद करता हुआ शेर के बालों से खेलने लगा | इससे शेर की नींद टूट गई और शेर ने गुस्से से चूहे पर पंजा मारकर उसे पकड़ लिया |शेर के पंजे की मार से चूहा कराहने लगा |
शेर गुस्से में चूहे से  बोला -'' अरे पिद्दी से चूहे मैं जंगल का राजा हूँ और में सो रहा था और तु मुझसे अटखेलियाँ कर रहा है ,  तूने मुझे जगा कर अच्छा  नहीं किया अब मैं तुझे मार दूंगा |''
चूहा डर के कारण थर-थर कम्पने लगा और हाँथ जोड़कर शेर से बिनती करता हुआ बोला -'' महाराज मुझे माफ़ कर दें , मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई , आगे मैं दुबारा गलती नहीं करूँगा ,मैं इतना छोटा हूँ कि  मुझे मारकर आपका पेट भी नहीं भरेगा , अगर आप मुझे छोड़ दें तो हो सकता है मैं भी किसी दिन आपकी सहायता कर सकूँ |''
चूहे की बात सुनकर शेर को हंसी आ गई और बोला-'' अरे तु तो इतना छोटा सा चूहा है तु क्या मेरी मदद करेगा ? लेकिन तु बातें बड़ी अच्छी करता है |''
शेर को चूहे की मासूमियत भा गई और शेर ने उसे अपने पंजे से मुक्त कर दिया | चूहे ने  आजाद होकर शेर का धन्यबाद किया और अपने बिल में चला गया |
कुछ दिन बाद एक शिकारी आया और उसने शेर की गुफा के पास ही  अपना जाल फैला दिया और जैसे ही शेर शिकार के लिये निकला   शेर उस जाल में फंस गया | शेर ने जाल से निकलने का बहुत प्रयत्न किया परन्तु वह जाल से बहार नहीं निकल पाया | शेर जाल में फंस कर अपने आप को बड़ा असहाय महसूस कर रहा था | अब शेर को डर सताने लगा की शिकार उसे मार डालेगा | शेर मदद के लिये  जोर-जोर से दहाड़ने लगा | शेर के आवाज सुनकर चूहा तत्काल उस जगह पहुँच गया जिधर शेर जाल में फंसा था |
चूहे ने तुरंत ही अपने नुकीले दांतों से जाल को काटना शुरु कर दिया और शिकारी के आने से पहले जाल को काट दिया अब शेर जाल से बाहर निकल चुका था  और वह अब आजाद था | शेर ने चूहे प्राण बचाने के लिये धन्यवाद दिया |

शिक्षा- किसी भी प्राणी को छोटा नहीं समझना चाहिये  और किसी पर किया गया उपकार कभी भी व्यर्थ नहीं जाता |