कौवा , सांप और सोने का हार कहानी | Crow, Snake and gold necklace story


Crow, Snake and gold necklace story,  kauva aur samp ki kahani, kauva aur sone ka har

कौवा , सांप और सोने का हार कहानी  | Crow, Snake and gold necklace story -

बहुत समय पहले की बात है एक पेड़ पर एक कौवा और उसकी पत्नी रहते थे | कुछ दिनों बाद  उसी पेड़ के नीचे बिल में एक सांप रहने के लिये आ गया | एक बार कौवा की बीबी ने कुछ अंडे दिये  | कौवा और उसकी पत्नी अपने अण्डों को घोंसले में छोड़कर खाने की तलाश में निकल गये और जब वे वापस लौटे तो उन्हें  अपने घोंसले में  अंडें नहीं मिले |दोनों को यह देखकर बहुत दुःख हुआ दोनों को समझ नहीं आ रहा था की अंडे किधर चले गए | उन्हें सक था कि पेड़ के नीचे रहने वाला सांप ही उनके  अंडे खा  गया होगा  परन्तु दोनों कुछ कर भी नहीं सकते थे | कुछ दिनों बाद कौवा की बीबी ने फिर अंडे दिये दोनों बहुत खुश थे इस बार कौवा ने निर्णय किया कि  खाना लेने वह अकेला ही जायेगा और उसकी पत्नी घर में रहकर अण्डों की रक्षा करेगी | कौवा के जाने के कुछ देर बाद पेड़ के नीचे रहने वाला सांप कौवा के घर के पास आता है और अंडे खाने के लिये आगे बढता है तो कौवा की पत्नी उसका विरोध करती है परन्तु वह उसे रोक नहीं पाती और सांप फिर अंडे खाकर चले जाता है |
कौवा जब घर लौटा तो उसकी पत्नी सारी घटना  कौवा को बतलाई | सारी बातें सुनकर कौवा को बहुत दुःख हुआ | कौवा इस बार वह सांप से बदला देने का प्रण  लेता है  | कौवा जनता था कि वह और उसकी पत्नी सांथ मिलकर भी सांप का कुछ नहीं कर सकते इसीलिये उसने चतुर  लोमड़ी से सहायता मांगी |
लोमड़ी बहुत चालाक थी उसने झट से कहा- '' सांप से तो मुझे भी बदला लेना है वह कई बार मुझे भी परेशान कर चुका है |''
लोमड़ी ने कौवा  को एक योजनाबतलाई |  योजना के अनुसार जब उस राज्य की राजकुमारी प्रतिदिन की भांती स्नान के लिये पास के तालाब में  आई और स्नान करने के पूर्व उसने अपना कीमती हार एक पत्थर पर रख दिया | उसी समय कौवा आया और राजकुमारी का हार उठा कर उड़ गया |
राजकुमारी अपने अंग रक्षकों को कौवा का पीछा  करने का आदेश देती है | कौवा अपनी योजनानुसार हार को सांप के बिल में डाल देता है | जब राजकुमारी के अंगरक्षक कौवा का पीछा करते-करते सांप के बिल के पास आते हैं तब उन्हें लगता है कि कौवा और सांप मिले हुए हैं इसी लिये कौवा सांप  के बिल में हार डाल गया है और अगर यह सांप जीवित रहा तो हार नहीं ले जाने देगा | राजकुमारी के सभी अंगरक्षक मिलकर उस सांप को मार देते  हैं |
इस तरह लोमड़ी की चालाकी से कौवा अपना बदला ले लेता है |अपना बदला पूरा होने पर  कौवा  चालाक लोमड़ी को धन्यबाद देता है और फिर कौवा और उसकी पत्नी शांति पूर्वक अपना जीवन जीने लगते है |

शिक्षा- '' कौवा , सांप और सोने के हार की कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि बुद्धिमानी और चालाकी से असंभव भी संभव किया जा सकता है |

चतुर ब्राम्हण और राक्षस की पंचतन्त्र कहानी | Chatur Bramhan Aur Rakshas Ki Panchtantra Kahanai -

CHATUR BRAMHAN AUR RAKSHAS KI KAHANI  चतुर ब्राम्हण और राक्षस की पंचतन्त्र  कहानी | Chatur Bramhan Aur Rakshas Ki Panchtantra Kahanai  -

बहुत पुरानी बात है एक गाँव में  एक वृक्ष के ऊपर   गंटक नाम का राक्षस रहता था  | एक बार की बात  है उस वृक्ष के नीचे से एक ब्राम्हण  गुजर रहा था तो राक्षस उसके कन्धों  पर जाकर बैठ गया |
राक्षस ब्राम्हण के कन्धों पर बैठते ही ब्राम्हण से कहने लगा  - ''  हे ब्राम्हण तुम मुझे पास के सरोवर तक ले चलो |''
ब्राम्हण के मन में विचार आया की यह स्वयं ही सरोवर तक जा सकता था तो मेरे कन्धों पर बैठ कर क्यूँ जा रहा है ?   ब्राम्हण ने डरते-डरते  पूछ लिया -''  तुम कौन  हो और मेरे कन्धों पर क्यूँ बैठे हो ?''
राक्षस बोला - '' मै एक राक्षस हूँ और  मेरा नाम गंटक है और तुम मुझे सरोवर तक ले चलो  नहीं तो मै तुम्हे खा जाऊंगा |''
ब्राम्हण ने राक्षस से पूछा-'' तुम खुद ही सरोवर तक क्यूँ नहीं चले जाते ?''
राक्षस बोला -''मैंने प्रण  लिया है की मैं गीले पैर जमीन  पर नहीं रखूँगा इसीलिये मैं तुम्हारे कन्धों पर बैठ कर जा रहा हूँ |''
ब्राम्हण उस राक्षस को सरोवर तक ले गया  जैसे ही दोनों सरोवर के पास पहुंचे राक्षस ब्राम्हण से बोला -'' अरे ब्राम्हण जब तक मैं इस सरोवर से नहाकर ना आ जून तुम कहीं मत जाना, नहीं तो मैं तुम्हे जीवित नहीं छोडूंगा  "''
जैसे ही राक्षस सरोवर में नहाने के लिया गया  ब्राम्हण ने सोचा की अगर यह राक्षस सरोवर से नहाकर आ जाता है तो पक्का ही यह मुझे खा लेगा और अगर मैं भागता हूँ तब भी यह मुझे दौड़ कर पकड़ लेगा और खा जायेगा | तभी ब्राम्हण को  एक बात की याद आई जो उसने बातों ही बातों में राक्षस से पूछ ली थी  कि राक्षस ने तो गीले पैर जमीन  पर नहीं रखने की कसम खाई है |
बस क्या था ब्राम्हण ने उस स्थान से दौड़ लगा दी और राक्षस उसे देखता ही रह गया क्यूंकि उसके पैर सरोवर मैं गीले हो गए थे और वह गीले पैर जमीं पर नहीं रख सकता था |

शिक्षा-'' पूछने में और शत्रू का  भेद लेने में क्या जाता है  ?''


दुष्ट बगुला और केकड़ा | Heron and crab story in hindi


bagula aur kekda kahani

दुष्ट बगुला और केकड़ा  | Heron and crab story in hindi -

बहुत समय पहले की बात है एक बगुला था वह धूर्त था  वह अब बूढ़ा हो गया था  | सरोवर के पास के सभी जीव-जंतु उसे बगुला दादा कहकर पुकारते थे | बगुला बूढ़ा होने के कारण  शिकार नहीं कर पा रहा था | एक बार भूख के कारण वह तालाब के  किनारे रो रहा था | एक केकड़े ने उस बगुले को रोते हुए देख लिया |
 केकड़ा बगुले के पास आया और उससे पूछने लगा - '' दादा बगुला क्या बात है आप बड़े परेशान लग रहे हो और रो भी रहे हो ?''
बगुला अगर केकड़े को सच बतला देता तो सरोवर के सारे जीव  बगुले का मजाक बना लेते |
 धूर्त बगुले के दिमाग में एक योजना आई उसने तत्काल केकड़े को उत्तर दिया - '' क्या बतलाऊं केकड़े भाई , मुझे अभी-अभी एक बहुत बड़े ज्योतिषी मिले थे वो मुझसे कहने लगे  कि आने वाले दो वर्ष के लिये इस क्षेत्र में अकाल पड़ेगा  उसमे यहाँ के सभी जीव जंतुओं  को खाने के लाले पड़ जायेंगें  और यह तालाब भी सूख  जायेगा | मै तो उड़कर कहीं और चला जाऊंगा परन्तु इस तालाब के सभी-जीव जंतु और मछलियों का क्या होगा ? यही सोच कर मैं रो रहा हूँ |
केकड़ा डर कर बोला - '' बगुला दादा आप तो सच कह रहे हैं इस सरोवर में तो बहुत कम पानी है यह तो जल्द ही समाप्त हो जायेगा , आप तो बहुत  बुजुर्ग और अनुभवी हो , आपने पहले भी इस तरह की मुसीबतों का सामना किया होगा , अब आप ही बतलाओ क्या करना चाहिये ?
बगुला कहने लगा -'' हाँ तुम सही कह रहे हो मैंने पहले भी  इस तरह की मुसीबतों का सामना किया है , मै तो उड़ कर कहीं दूसरे देश चला जाऊंगा परन्तु मुझे चिंता इस सरोवर में रहने वाले  जीवों की है जो हमेशा दुःख-सुख में मेरे सांथ रहे उन्हें मुसीबत के समय छोड़ कर कैसे चला जाऊं ?
केकड़ा बोला -'' आखिर हम कर भी क्या सकते हैं ?''
दुष्ट बगुले ने तत्काल जबाब दिया - '' यहाँ से कुछ मील दूर एक बहुत बड़ा सरोवर है , वह सरोवर इतना विशाल है की आने वाले दस वर्ष तक भी बारिश ना हो तो भी  नहीं सूखेगा |हम सभी को वहीँ चलना चाहिये |''
केकड़ा भी बगुले की बात से सहमत हो गया और अकाल आने की खबर सरोवर के आस-पास  जंगल में आग की तरह फ़ैल गई | सरोवर के सभी जीव बगुले की बातों में आ गए और मुसीबत से बचने की सलाह लेने लगे |
बगुला ने सभी से कहा -'' अभी अकाल पड़ने में समय है तब तक सरोवर के सारे जीवों को मैं अपनी पीठ पर बैठाकर बड़े तालाब तक ले जाऊंगा और अकाल आते-आते इस सरोवर के सारे जीवों को  बड़े तालाब में पहुंचा दूंगा |
सरोवर के सभी जीव बगुले की बातों में आकार तालाब छोड़कर दूसरे  तालाब में जाने के लिये तैयार हो गए | दुष्ट बगुला भी यही चाहता था | ''
दुष्ट बगुला  प्रतिदिन किसी ना किसी जीव को  तालाब से अपनी पीठ पर बैठाकर ले जाता और एक पहाड़ी पर गिराकर उसे मार देता और खा जाता था | कई दिनों तक  बगुला इसी तरह मछलियों और तालाब के दूसरे  जीवों को मार देता और खा जाता था और मौज से अपना जीवन जी रहा था |
एक दिन केकड़ा बगुले के पास पहुंचा और बोला -'' बगुला दादा  सबसे पहले अकाल के बारे में अपनी चर्चा हुई थी , अभी तक आपने कई मछलियों और जीवों को बड़े सरोवर भेज दिया है परन्तु मुझे अभी तक नहीं भेजा है ,कृपया मुझे भी जल्द से जल्द वहां भेज दें |''
बगुला भी सोचने लगा कि कई दिनों से मछलियाँ खा रहा हूँ क्यूँ ना आब केकड़े का स्वाद चखा जाये | बगुला तत्काल तैयार हो गया | केकड़ा बगुले की पीठ पर सवार हो गया | जब दोनों उस पहाड़ के पास पहुंचे जिधर बगुला मछलियों और दुसरे जीवों को गिराकर मार देता था तभी केकड़े की नजर हड्डियों के ढेर पर पड़ी केकड़े को तत्काल सारी कहानी समाज आ गई |
तभी बगुला बोला-'' अरे केकड़े तुम्हारी कोई आखिरी इच्छा हो तो कहो अब मैं तुम्हें यहाँ से गिराकर मार दूंगा और अपना पेट भरूँगा |''
केकड़े ने तत्काल अपने पैने डंक दुष्ट बगुले  की गर्दन में गड़ा  दिए | बगुला जैसे तैसे पहाड़ी पर उतरा परन्तु तब तक उसके प्राण पखेरू उड़ गए |
केकड़ा धीरे-धीरे वापस अपने सरोवर आ गया जब सरोवर के दुसरे जीवों ने बगुला के बारे में पूछा तब केकड़े ने सारी बात बतला दी | तालाब के सारे जीवों को अपनी गलती का पछतावा हुआ |

शिक्षा -  बुराई का अंत बुरा ही होता है |

प्यासा कौवा कहानी | Thirsty Crow Story in Hindi


प्यासा कौवा कहानी  , Thirsty Crow Story in Hindi , pyasa kouva, pyasa kouwa, pyasa kauvaa kahani
Thirsty Crow Story in Hindi

प्यासा कौवा कहानी  | Thirsty Crow Story in Hindi -

बहुत समय पहले की बात है गर्मी के दिन थे |   एक कौवा था उसे बहुत जोरों की प्यास लगी थी |वह गर्मी के दिनों में पानी की तलाश में  उड़ रहा था लगातार उड़ने के कारण  कौवा  की प्यास और अधिक बढती जा रही थी |  प्यास के कारण उसका बहुत बुरा हाल था |
तभी अचानक प्यासे  कौवा को  एक जगह पानी का मटका दिखलाई दिया | वह अपनी प्यास मिटाने के लिये उस मटके के पास उतर गया | कौआ ने देखा कि मटके में बहुत कम पानी है  | कौवा ने  मटके से पानी पीने का प्रयत्न किया परन्तु कौआ की चोंच पानी तक नहीं पहुँच पा रही थी |  कौवा बहुत प्यासा था पानी तो उसके सामने था पर वह उसे पी नहीं पा रहा था |  कौवा को कुछ समझ नहीं आ रहा था की वह क्या करे ?
प्यासा कौवा कहानी  , Thirsty Crow Story in Hindi , pyasa kouva, pyasa kouwa, pyasa kauvaa kahani
pyasa kouwa
 उसने आस-पास देखा कहीं और पानी मिल जाये परन्तु उस मटके की सिवा कहीं  और पानी नहीं था | अब कौआ सोचने लगा की क्या किया जाये कि इस पानी तक मेरी चोंच पहुँच जाये  ?
तभी उसे पास में कुछ कंकड़ और पत्थर दिखलाई दिये  | प्यासे  कौवा के दिमाग में एक उपाय सूझा उसने सोचा की अगर मैं ये कंकड़ मटके में दाल दूँ तो पानी ऊपर आ जायेगा और मैं अपनी प्यास मिटा सकता हूँ  | 
अब क्या था कौआ एक-एक कर कंकड़ उठाता और मटके में दाल देता | कौवा जैसे जैसे मटके में कंकड़ डालता मटके का पानी धीरे-धीरे ऊपर आने लगा | अब  कौवा का होंसला बढ़ने लगा |वह मटके में तेजी से कंकड़ डालने लगा  |  कौवा की मेंहनत रंग लाई और मटके का पानी ऊपर आ गया |  कौवा ने जी भर पानी पिया और अपनी प्यास मिटाई |
शिक्षा- '' सूझ-बूझ  और धैर्य से कठिन कार्य भी आसानी से किया जा सकता हैं और विपत्ति से छुटकारा पाया जा सकता है |''

प्यासा कौवा कहानी  , Thirsty Crow Story in Hindi , pyasa kouva, pyasa kouwa, pyasa kauvaa kahani
 प्यासा कौवा कहानी

खरगोश और कछुआ की कहानी | Rabbit and Tortoise Story in Hindi -

Rabbit and Tortoise Story in hindi, kachua aur khargosh ki kahani

खरगोश और कछुआ की कहानी | Rabbit and Tortoise Story In Hindi -

बहुत समय पहले की बात है एक बहुत ही खुबसूरत जंगल था | जंगल में सभी जानवर बहुत ही हंसी -खुशी रहते  थे और दिन भर मौज मस्ती करते थे | उस जंगल में एक खरगोश और एक कछुआ भी रहते थे , दोनों में अच्छी दोस्ती थी | खरगोश बहुत तेज दौड़ता था और कछुआ बहुत ही धीमी  चाल से चलता था |  खरगोश को अपनी तेज चाल  का बहुत घमण्ड था और वह हमेशा ही कछुये का मजाक उड़ाया करता था | कछुआ भी खरगोश की बात का बुरा नहीं मानता था |
एक बार की बात है , खरगोश अपने मित्र कछुआ से बोला- ''मित्र , क्या तुम मेरे सांथ दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेना  चाहोगे |''
कछुआ बोला- ' मित्र खरगोश जैसी तुम्हारी मर्जी , अगर तुम दौड़ प्रतियोगिता करना चाहते हो तो ठीक है मुझे को आपत्ति नहीं है  | ''
जंगल के जानवरों ने बड़े जोर-शोर से दौड़ प्रतियोगिता की तैयारियां शुरू कर दी | खरगोश  और कछुआ की दौड़ प्रतियोगिता शुरू होने वाली थी | जंगल के सभी जानवर प्रतियोगिता देखने के लिये आ गए | दौड़ के लिये  एक पहाड़ी पर जाना था जो पहले पहाड़ी पर पहुचेगा वही जीतेगा | जंगल के सभी जानवर जानते थे की खरगोश तेज दौड़ता है उन्हें उम्मीद थी की खरगोश ही यह दौड़ जीतेगा |

दौड़ प्रारम्भ की गई | खरगोश ने शुरू से ही तेज दौड़ने लगा और कुछ ही देर में वह कछुआ से बहुत आगे निकल गया | खरगोश एक छायादार पेड़ के नीचे पहुंचा और  पीछे मुड़कर देखा तो उसे कछुआ कहीं नहीं दिखा | ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी खरगोश ने सोचा कछुआ तो अभी बहुत दूर है क्यूँ ना थोड़ी देर इस पेड़ की छाया में आराम कर लूँ ?
kachua aur khargosh ki kahani , Rabbit and Tortoise Story In Hindi
खरगोश ने जैसे ही आखें बंद की उसे नींद लग गई | कुछ देर में कछुआ भी वहीँ पहुँच गया और वह खरगोश को देखकर आगे बढ़ गया | बहुत देर बाद अचानक खरगोश की नींद खुली उसने आगे-पीछे देखा उसे कहा दिखलाई नहीं दिया  |  कुछ देर बाद उसने देखा की कछुआ पहाड़ी पर पहुँचने वाला है | खरगोश अपनी पूरी शक्ति लगाकर दौड़ा परन्तु उसके पहाड़ी पर पहुँचने के पहले ही कछुआ पहाड़ी पर पहुँच चुका था और कछुआ ने यह दौड़ जीत ली |
खरगोश अपनी गलती और अभिमान पर बहुत  पछताया और उसने कछुआ की हंसी उड़ाने  पर कछुआ से माफ़ी मांगी |

शिक्षा- ' हमें कभी भी अपने गुणों पर अभिमान नहीं करना चाहिये |''

रंगा सियार - पंचतन्त्र की कहानी | Ranga Siyar - Panchtantra Kahani


रंगा सियार - पंचतन्त्र की कहानी 

बहुत समय पहले की बात है एक जंगल में शातिर  सियार रहता था | एक बार जंगल में बहुत ही भयानक आंधी-तूफ़ान आया | इस आंधी में एक बड़ा पेड़ गिरने से सियार दब कर घायल हो गया वह किसी तरह बचता-बचाता अपनी गुफा में पहुँच गया और कुछ दिनों बाद जब स्वस्थ होने के पश्चात अपनी गुफा से बाहर निकला |कई दिनों तक खाना ना मिलने के कारण बहुत कमजोर हो गया था | गुफा से निकलने के बाद उसने खरगोश,तीतर,और कई छोटे जानवरों का शिकार करने का प्रयत्न किया परन्तु शरीर दुर्बल हो जाने के कारण वह जल्दी थक जाता था और शिकार नहीं कर पाया | उसने सोचा ऐसे तो मैं भूखा ही मर जाऊंगा | सियार आसन शिकार की तलास में मानव बस्ती की घुस गया  उसने सोचा की कोई मुर्गी या किसी जानवर का बच्चा हाँथ लग जायेगा |यह सोचकर वह गाँव की गलियों में शिकार की तलास में घूमने  लगा | गाँव के कुत्तों ने सियार को देख लिया और भौंकते हुए उसके पीछे पड़ गये| कहाँ सियार आया था शिकार करने और अब सियार की जान पर बन आई | धीरे-धीरे कुत्तों की टोली बढती जा रही थी सियार गली-कुचों में जान बचाकरभाग रहा था परन्तु दुर्बल शरीर के कारण वह बुरी तरह थक गया था | भागते -भागते वह कपडा रंगने वालों (रंगरेजों ) की बस्ती में पहुँच गया | वहां एक घर के आगे एक टैंक था सियार ने जान बचाने के लियेटैंक में छलांग लगा दी | रंगरेज ने उस टैंक  में कपड़ा रंगने के लिये रंग घोल रखा था | सियार सपनी साँस रोक कर टेंक में डूबा रहा | कुत्तों की टोली आगे निकल गई |
सियार साँस लेने के लिये ही अपना मुँह बहार निकलता था | सियार को जब विश्वास हो गया की कुत्तों की टोली आगे निकल गई  तब उसने आस-पास देखा और चुपके से टैंक से बाहर आकर जंगल में भाग गया | टैंक में घोले गए नीले रंग के कारण सियार का पूरा शरीर रंग गया था और सियार का पूरा शरीर नीले रंग का दिखलाई देने लगा | जंगल का जो भी जानवर सियार को देखता वह उसके इस अनोखे नीले रंग को देख कर डर जाता था | जंगल के दूसरे जानवरों को इस तरह डरता देख कर सियार के दिमाग में एक योजना आई | नीले  रंग के उस रंगा सियार ने भागते हुए जानवरों को रोका और कहा -'' आप सब भागो  नहीं और मेरी बात सुनो |''
नीले रंग के रंगा सियार की बातें सुनकर जंगल के सभी जानवर रुक गए | रंगा सियार बोला-'' आप सभी मुझसे डरें  नहीं , आपने मेरे जैसा रंग कभी किसी दूसरे जानवर का नहीं देखा होगा , मुझे   भगवान  ने यह अनोखा रंग प्रधान किया है , आप जंगल के सभी जानवरों को बुलाकर लाओ , आप सभी के लिये भगवान  ने सन्देश भिजवाया है |''
उस नीले रंग के रंगा सियार की बातों में आकर उस जगह जंगल के सभी जानवर आ गए | नीले रंग का रंगा सियार एक ऊँचे पत्थर पर चढ़ गया और सभी जानवरों को संबोधित करके बोला- '' मेरा नाम  ककुदुम है , आप सभी के लिये भगवान  ने एक सन्देश भेजा  है | भगवान  ने मुझे यह अनोखा रंग प्रदान कर पृथ्वी पर जाने का आदेश दिया  और पर्थ्वी पर जानवरों का कोई भी सर्वमान्य शासक ना होने के कारण मुझे यहाँ का शासक बनाकर भेजा है |आप सभी मुझे  सम्राट ककुदुम के नाम से जानोगे | अब आप अनाथ नहीं रहे , आप सभी निर्भय होकर जंगल में घूम सकते हो | ''
सभी जानवर रंगा सियार के नीले रंग को देखकर उसकी बातों में आ गए यहाँ तक शेर और बाघ की भी इतनी हिम्मत नहीं हुई की उसकी बातों को काट सकें | जंगल के सभी जानवर नीले रंग के रंगा सियार सम्राट ककुदुम के आगे नतमस्तक हो गए और सर्वसम्मति से उसे अपना राजा चुन लिया |
सम्राट ककुदुम ने जंगल के सभी जानवरों को उनकी जिम्मेदारियां दे दी | उसनेहांथी को  अपना सेनापति बनाया , शेर और बाघ को अपना अंगरक्षक नियुक्त किया |अब रंगा सियार सम्राट ककुदुम  के राजसी ठाठ हो गए वह जिधर भी जाता शेर और बाघ उसके आजू-बाजू चलते और हांथी अपनी सूंड से चिंघाड़कर सभी को महाराज के आने की सुचना देता , भालू पंखा झुलाता था |रोज उसके लिये राजसी भोजन परोसा जाता और वह जंगल में जिधर भी जाता उसका बड़ा  मान सम्मान होता |  रंगा सियार  सम्राट ककुदुम प्रतिदिन ऊँचे पत्थर पर बैठकर अपना दरवार लेता था |
 रंगा सियार  सम्राट ककुदुम  जानता  था की अगर उसके जात  भाई दूसरे सियार इस जंगल में रहे तो वो उसे अवश्य पहचान लेंगे | इसी कारण उसने सम्राट बनते ही दूसरे सियारों को जंगल से निकलवा दिया |
एक दिन सम्राट ककुदुम अपनी गुफा में आराम कर रहा था | बाहर चाँद निकला था और दूधिया रौशनी थी | नीला सियार सुहानी रात में बाहर निकला  पास के जंगल से सियारों की टोली ' हू हू हू --' की आवाज निकाल रही थी | उस '  हू हू हू --' की आवाज को सुनकर नीला रंगा सियार अपना आपा खो बैठा और उसके अन्दर के जन्मजात  सियारों वाली आदत ने जोर मारा और वह भी चाँद की ओर मुँह ऊँचा कर ' हू हू हू --' की आवाज  निकालने लगा |''
सिंह और बाघ ने उसे 'हू हू हू --' की आवाज  निकालते देख लिया | सिंह बोला- ''अरे यह तो धूर्त रंगा सियार है , इसने हमें दोखा दिया और खुद सम्राट बन कर मौज उड़ा रहा है , चलो अभी इसे सबक सिखाते हैं |''
फिर क्या था सिंह  और बाघ ने मिलकर रंगा सियार को मार डाला |

शिक्षा- 

'' किसी को धोखा नहीं देना चाहिये , बेईमानी का फल बुरा होता है | "

ईमानदारी का फल मीठा होता है -हिंदी कहानी | Imandari ka fal


IMANDARI KA FAL - HINDI KAHANI

ईमानदारी का फल मीठा होता है  -हिंदी कहानी

बहुत समय पहले की बात है  एक राज्यमें एक धनवान  और प्रतिष्ठित व्यक्ति व्यक्ति रहता था | एक बार उसके राज्य  में अकाल पड़ा | चारो तरफ लोग भूख से मर रहे थे पशु पक्षी भी भूख-प्यास से तड़प रहे थे | ऐसी
स्थित में राज्य के उस  धनवान  व्यक्ति ने बच्चों के लिये प्रतिदिन एक रोटी देने का निश्चय किया और चारो तरफ घोषणा करवा दी |
 दूसरे दिन सुबह  से ही उस  व्यक्ति के घर के सामने बच्चों की भीड़ लग गई | वह व्यक्ति अपने हांथों से बच्चों को रोटी बांटने लगा | रोटियां बड़ी-छोटी थीं | सभी बच्चे बड़ी रोटियां लेना चाह रहे थे इसिलए बच्चे आपस में धक्का मुक्की करने लगे | उस धनि व्यक्ति ने देखा एक छोटी बच्ची एक तरफ़ा चुपचाप खड़ी होकर अपनी बारी आने का इंतजार कर रही थी और जब सभी बच्चों  को रोटियां बंट गई उस लड़की रोटी लेने के लिये आगे बढ़ी | उस बच्ची के लिये एक ही रोटी बची थी वह भी छोटी रोटी थी | बच्ची ने खुशी-खुशी रोटी ले ली और अपने घर चली गई |
दूसरे दिन उस धनि व्यक्ति ने पुनः रोटियां बांटी सभी बच्चों ने फिर रोटियां ली और इस बार भी उस छोटी बच्ची को सबसे आखिरी  में छोटी रोटी ही मिली | कई दिनों तक यह क्रम चलता रहा वह धनवान व्यक्ति रोज इस दृश्य को देखता था | एक दिन बच्ची  रोटी अपने घर ले गई और जब उसने रोटी तोड़ी  तो उसमें सोने का सिक्का मिला | उस बच्ची ने अपनी माँ को सिक्का दिखलाया | उसकी माँ ने सिक्के को धनवान व्यक्ति को वापस करने के लिये कहा |
बच्ची अगले दिन रोटी लेने गई और उस धनि व्यक्ति को सिक्का लौटकर   बोली -'' मुझे रोटी में यह सोने का सिक्का मिला है शायद रोटी बनाते समय आंटे  में गिर गया होगा इसी कारण मैं इस सोने के सिक्के को लौटने आई हूँ |''
उस नन्ही सी बच्ची की बातें सुनकर वह व्यक्ति बहुत खुश हुआ और सोने का सिक्का बच्ची को वापस कर  बोला-बेटी , यह सोने का सिक्का तुम्हारे धेर्य और संतोष का ईनाम है |''
बच्ची बोली- '' मुझे रोटी लेने के लिये धक्के नहीं खाने पड़े यही मेरे लिये ईनाम है मैं इसी में खुश हूँ |''
दरअसल उस धनवान व्यक्ति ने जानबूझ का उस रोटी में सोने का सिक्का डाला था | बच्ची की ईमानदारी देखकर उसने बच्ची को अपनी पुत्री के समान दर्जा दिया |
शिक्षा- '' जो व्यक्ति अनावश्यक लालच नहीं करता और संतोषी जीवन जीता है वह जीवन में हमेशा खुश रहता है |''