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Ullu aur Kouva ki Kahani

कौआ और उल्लू की कहानी | Kouva aur Ullu Ki Kahani 

प्राचीन समय की बात है दक्षिण भारत के एक शहर के पास पीपल के वृक्ष पर कौओं का झुण्ड रहता था जिसका राजा मेघवर्ण नामक कौआ था | मेघवर्ण बहुत समझदार और कुशल शासक था | जहाँ कौवे रहते थे वहां से कुछ ही दूरी पर पहाड़ की गुफाओं में उल्लुओं का झुण्ड रहता था जिसका राजा अरिदमन नामक उल्लू था | अरिदमन बहुत ही तेजतर्रार और दुष्ट प्रवृति का था | उल्लू और कौवों की दुश्मनी बहुत पहले से चली आ रही थी | रात के समय उल्लुओं को कौवों से ज्यादा अच्छा दिखलाई देता है इसीलिए अरिदमन उल्लू अपने सांथियों के सांथ पीपल के वृक्ष के पास मंडराता रहता और अँधेरे में जो भी कौआ घूमते मिल जाए उसे मार देता था |

उल्लुओं की इन हरकतों से कौवों में बहुत डर बैठ गया | परेशान होकर कौवों के राजा मेघवर्ण ने सभा बुलाई और उल्लुओं के आतंक से कैसे छुटकारा पाया जाए इस सम्बन्ध में सभी से मंत्रणा की गई | मेघवर्ण ने कहा – “ हमारा शत्रु बहुत होशियारी से प्रतिदिन हमारे सांथियों को मार रहा है और हमारी आवादी धीरे-धीरे कम होती जा रही है अगर यही सब चलता रहा तो एक दिन हम में से कोई भी नहीं बचेगा |  रात में जब हमें कम दिखलाई देता है तब वो बहुत अच्छी तरह से देख सकते है और उसी समय हमारे सांथियों पर हमला करते है | हमें इन दुश्मनों से कैसे मुकाबला करना चाहिए इस पर आप सभी अपने –अपने मत प्रकट करें ?

मेघवर्ण के मंत्रियों ने अपने-अपने विचार रखे | कुछ मंत्रियों ने बलवान शत्रु से युद्ध नहीं करके संधि करने की सलाह दी तो कुछ ने शत्रु को छल से मारने की सलाह दी | कुछ अन्य मंत्रियों ने इसी स्थान पर रहकर शत्रु से मुकाबला करने के लिए कहा तो कुछ अन्य मंत्रियों ने इस स्थान को छोड़कर दूसरी जगह जाने की सलाह दी |

वहीँ एक मंत्री ने कहा- “ महाराज क्रूर, अत्यंत लालची और धर्महीन वैरी से कभी भी संधि नहीं करना चाहिए |हमें किसी शक्तिशाली सहायक की सहायता से शत्रु का विनाश करना चाहिए और अगर एक शक्तिशाली सहायक ना मिले तो कुछ छोटे-छोटे मित्रों की सहायता लेनी चाहिए |

 सभी मंत्रियों की बात सुनकर मेघवर्ण ने अंत में सबसे वृद्ध मंत्री जिसका नाम स्थिरजीवी था की सलाह ली | स्थिरजीवी कौआ बोला- “ आपके सभी मत्रियों ने अपने अपने अनुसार सही सलाह दी है पर मेरा मानना है की हमें भेद-नीति का सहारा लेना चाहिए | हम छल द्वारा शत्रु को मात दे सकते हैं | हमें छल से शत्रु का विश्वास जितना चाहिए और युद्ध की तैयारियां करते रहना चाहिए | संधि कल में शत्रुओं की कमजोरियों का पता लगाते रहना होगा  और अवसर आने पर शत्रु पर हमला करना होगा |

मेघवर्ण को स्थिरजीवी की सलाह अच्छी लगी और उसने स्थिरजीवी से आगे की रणनीति के बारे में पूछा | स्थिरजीवी बोला- “ छल द्वारा बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति को धोखा दिया जा सकता है | हम छल से शत्रु को पराजित करेंगें | मै स्वयं गुप्तचर का काम करूँगा | आप मेरे सांथ विवाद करें और सभी के सामने मुझे अपनी चोंच से मारकर लहू-लुहान कर देना | इसके बाद आप दल-बल और परिवार सहित सुरक्षित स्थान पर जाकर रहना | मैं तब तक उल्लुओं का विश्वास जीत लूँगा और हम उनके भेद जानकर उन पर हमला का उनका विनाश कर देंगें फिर आप वापस इसी जगह आ जाना |”

मेघवर्ण कौए ने स्थिरजीवी की रणनीति पर कार्य करते हुए उससे विवाद शुरू कर दिया | उनके विवाद में कुछ कौवे बीच-बचाव के लिए भी आये पर मेघवर्ण ने उन्हें दूर हटाते हुए कहा –“ यह स्थिरजीवी हमारे शत्रुओं से मिला हुआ है और उन्हें हमारे सारे भेद बतला दिए हैं अब हमारा इस स्थान पर रहना उचित नहीं है |“

इतना बोलकर उसने स्थिरजीवी पर अपनी चौंच से हमला कर उसे लहुलहान कर दिया और पेड़ के नीचे छोड़कर अपने झुण्ड और परिवार सहित एक सुरक्षित स्थान पर चला गया | यह बात गुप्तचरों के माध्यम से उल्लुओं के राजा अरिदमन को पता चली वह तुरंत ही अपने दल-बल के सांथ उस स्थान पर पंहुचा जिधर कौवे रहा करते थे परन्तु उलूकराज को उधर कोई भी कौआ नहीं मिला | उल्लुओं को देख कर पेड़ से नीचे गिरे स्थिरजीवी कौवे ने कराहना शुरू  कर दिया | कौवे के कराहने की आवाज सुनकर सभी उल्लू उसके पास पहुँच गए और कुछ उल्लुओं ने उस पर हमला करना चाहा  परन्तु उल्लुओं के राजा अरिदमन ने उन्हें हमला करने से रोकते हुए कहा –“ यह अकेला है और घायल भी , हम इसे कभी भी मार सकते है परन्तु इससे हमें कई राज भी जानने को मिल सकते है |”

जैसे है उल्लुओं का राजा अरिदमन स्थिरजीवी कौवे के पास पहुंचा स्थिरजीवी उसे प्रणाम कर बोला- “ महाराज ! आप बहुत बलशाली है | हम कौवों का राजा मेघवर्ण आप पर हमला करना चाहता था | मैंने उसके समझाया कि हम उल्लुओं से लड़ाई में नहीं जीत सकते  | हमें उनसे संधि कर लेना चाहिए इससे कम से कम हमारे प्राण तो बच जायेंगें किन्तु उसने मुझे उल्लुओं का हितैसी समझकर मार-मार कर लहुलुहान कर दिया उसे लगा अब आप उस पर आक्रमण कर देंगें इसीलिए मुझे मृत समझकर किसी सुरक्षित स्थान पर चला गया | मै अब आप की शरण में हूँ और अब मेरे जीवन का लक्ष्य अपने अपमान का बदला लेना है | अगर आप मुझे अपने सांथ रखेंगे तो मै अवश्य ही आपके काम आऊंगा | ”

स्थिरजीवी कौए की बात सुनकर उल्लुओं का राजा असमंजस में पड़ गया उसने अपने मंत्रियों की सलाह ली कुछ ने कहा की इसे मार देते है तो कुछ मंत्रियों ने स्थिरजीवी को अपने सांथ मिलाकर कौवों के भेद जानने की बात कहकर और शरणागत की रक्षा करते हुए उसे जीवन दान देने की बात कही |

उल्लुओं में रक्ताक्ष नामक एक चालाक होशियार मंत्री भी था उसने स्थिरजीरवी का बहुत विरोध किया परन्तु उसके विरोध के बाद भी स्थिरजीवी कौए को उल्लुओं के यहाँ शरण मिल गई | रक्ताक्ष अपना अपमान सहन नहीं कर पाया और अपने सांथियों को एकत्र कर कहा- “ अब मुझे उल्लुओं का सर्वनाश दिखलाई दे रहा है यह चालक कौवा अपनी नीति में सफल हो गया है अब हमें किसी दुसरे स्थान पर रहना चाहिए | “ इस प्रकार उल्लुओं का एक समझदार मंत्री उनसे अलग हो गया |

रक्ताक्ष के चले जाने से स्थिरजीवी कौआ बहुत खुश हुआ क्यूंकि अब उसका काम बहुत आसान हो गया था | उल्लुओं के मंत्रियों में रक्ताक्ष ही सबसे चतुर , होशियार और दूरदर्शी था |

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Ullu aur Kouva ki Kahani

इसके बाद स्थिरजीवी कौआ उल्लुओं के विनाश की तैयारियों में जुट गया | वह प्रतिदिन छोटी-छोटी लकड़ियाँ एकत्र करता और पर्वत के गुफाओं के पास उन्हें जमा देता था | जब लकड़ियाँ पर्याप्त मात्रा में एकत्र हो गई तो वह दिन के समय (जब उल्लुओं को कम दिखलाई देता है ) कौवों के राजा मेघवर्ण से मिलने पहुँच गया | स्थिरजीवी बोला –“ मैंने उल्लुओं की गुफाओं के पास पर्याप्त सूखी लकड़ियाँ एकत्र कर दी है अब तुम दिन के समय जब उल्लुओं को दिखलाई नहीं देता , अपनी-अपनी चौंच में जलती लकड़ियाँ लाकर गुफाओं के चारो तरफ डाल देना इससे शत्रु  अपने दल-बल के सांथ जलकर समाप्त हो जायेगा |”

मेघवर्ण ने वैसा किया किया जैसा स्थिरजीवी ने कहा | सभी कौवे अपनी-अपनी चोंचों में जलती लकड़ी ले गए और उल्लुओं की गुफाओं के चारो तरफ फैला दी इससे उल्लुओं के घर जल गए और कौवों की शत्रु सेना नष्ट हो गई | उल्लुओं का विनाश के बाद मेघवर्ण अपनी सेना और परिवार सहित उसी पीपल के वृक्ष पर लौट आया और उसने सभा बुलाकर स्थिरजीवी कौए का सम्मान कर आभार जताया | कौवों द्वारा मिल रहे सम्मान से स्थिरजीवी बहुत खुश था | उसने कहा –“ शत्रु के बीच रहने वाले गुप्तचर को मान-अपमान की चिंता छोड़कर सिर्फ अपने देश और राजा की भलाई के बारे में ही सोचना चाहिए | बड़े उद्धेश्य की पूर्ति में कुछ छोटी-मोटी कठनाईयों का सामना तो करना ही पड़ता है पर क्षणिक कष्टों की चिंता ना करते हुए देश की भलाई के बारे में ही सोचना चाहिए | एक बात हमेशा याद रखना राज्य स्थाई नहीं होते | सत्ता के घमण्ड में आकर प्रजा पर अन्याय नहीं करना चाहिए | राजा प्रजा का सेवक होता है ना की उसका स्वामी |”

मेघवर्ण ने स्थिरजीवी के उपदेशों का सदैव पालन किया और कई वर्षों तक राज-पाठ का सुख भोग कर आनंद पूर्वक जीवन यापन किया |

शिक्षा- “ कौवा और उल्लू की कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि साहस, होशियारी और मित्र-भेद नीति से बड़े से बड़े शत्रु को भी हराया जा सकता है |”